Virat Kohli: भारतीय क्रिकेट टीम के इतिहास में दिग्गज खिलाड़ियों और उनकी सफलता के लाखों किस्से सुनहरे अक्षरों में लिखे हुए हैं. इन्ही में से एक, सफलता के फलक पर चमकता एक ऐसा सितारा है, जिसके क्रिकेट गुरु बनने की कहानी, उसकी शिद्दत को दिखाती है, उसकी लगन को दर्शाती है. नाम है विराट कोहली. फैन्स उन्हें किंग कोहली के नाम से भी बुलाते हैं... लेकिन कोहली का कद जितना विराट है, उनके संघर्ष की कहानी उससे कहीं ज्यादा गहरी है. जब भी टीम को जरूरत होती है, मैच बड़े होते हैं, विराट वहां उम्मीद की किरण बनकर हमेशा खड़े होते हैं.
ये वहीं विराट कोहली हैं, जो अपने पिता के देहांत के अगले दिन पिच पर चौकों-छक्कों की बरसात करते हैं. ये बात 18 दिसंबर 2006 की है. देर रात दिल का दौरा पड़ने से विराट के पिता प्रेम कोहली का निधन हो गया था. उस वक्त दिल्ली में रणजी ट्रॉफी का मैच चल रहा था. कर्नाटक के खिलाफ कोहली नाबाद पारी खेल रहे थे. अगले दिन का मैच बचा हुआ था. इस बीच देर रात दुखों का पहाड़ विराट और उनके परिवार पर टूट पड़ता है. लेकिन भावनाओं के सैलाब को थामते हुए विराट फैसला करते हैं कि अगले दिन होने वाले मैंच में वो खेलेंगे. फिर होता भी वही है.
अपने आंसुओं को रोंके विराट अगले दिन पिच पर उतरते हैं और धुंआधार बैटिंग करते हैं. पिछले दिन 40 रनों की पारी को आगे बढ़ाते हुए 90 तक ले जाते हैं और फिर अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी शामिल होते हैं. जिन परिस्थितियों में विराट ने वो रणजी मैच खेला, उसकी कल्पना करना भी हमारे लिए रोंगटे खड़े कर देने वाला है. विराट ने इसे लेकर खुद एक बार कहा था कि रात के ढाई बजे वो नहीं रहे. मैंने उन्हें आखिरी सांस लेते हुए देखा. परिवार के सभी लोग टूट चुके थे और रो रहे थे, लेकिन मेरी आंख से आंसू नहीं आ रहे थे. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो गया, मैं बस सन्न था. मैंने अपने कोच को सुबह फोन किया और जो कुछ भी हुआ उसके बारे में बताया और कहा कि मैं आगे खेलना चाहता हूं, क्योंकि चाहे कुछ हो क्रिकेट छोड़ना मुझे मंजूर नहीं था. मैच के बाद जब ड्रेसिंग रूप में मेरे टीम के साथी मुझे सांत्वना दे रहे थे, तब मैं बिखर गया और रोने लगा था.
विराट कोहली से जुड़ा ये किस्सा हमें सिखाता है कि कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हो, हमें बहानों की आड़ में छिपकर बैठना नहीं चाहिए. बल्कि आगे का रास्ता तय करते रहना चाहिए. 5 नवंबर 1988 को दिल्ली में जन्में विराट कोहली ने 9 साल की उम्र में बल्ला थामा था और आज तक नहीं छोड़ा. बचपन में विराट ने भले ही कॉपी-पेन से ज्यादा नाता नहीं रखा. लेकिन क्रिकेट की पिच पर जब से खड़े हुए तो उतरे नहीं.
यहीं वजह थी कि 12 साल का होते-होते दिल्ली क्रिकेट में उन्होंने अपना नाम बना लिया था. विराट की लगन का ही नतीजा था कि उनके पिता ने हमेशा उन्हें सपोर्ट किया. विराट की मेहनत देखकर पिता को भी उन पर नाज़ था. भले ही अब वो इस दुनिया में नहीं है. विराट की सक्सेज को वो जहां से भी देख रहे होंगे, उन्हें उन पर नाज होगा और एक भारतीय होने के नाते हमें भी विराट कोहली पर फर्क है.
आज हम जिन विराट को विरोधियों के छक्के छुड़ाते देखते हैं, वो विराट कोहली ऐसी आग में जलकर सोना बने हैं, जिसे लोग सहन भी नहीं कर सकते. उनकी मेहनत को सलाम है. क्रिकेट को लेकर जुनून ऐसा है कि दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी भी अपनी प्रेरणा का स्त्रोत विराट कोहली को बताते हैं. सचिन तेंदुलकर से उनकी तुलना करते हैं. कहा जाता है कि कोहली जैसा खिलाड़ी सदियों में सिर्फ एक ही होता है और आंकड़े इस बात की गवाही बखूबी देते हैं.
सिर्फ इतना ही नहीं है, विराट कोहली वनडे फॉर्मेट के सबसे सफल बल्लेबाजों में से एक हैं. उन्होंने इस फॉर्मेट में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं. वनडे में सबसे ज्यादा शतक लगाने का रिकॉर्ड विराट कोहली के ही नाम पर है. वो इस फॉर्मेट में अब तक 51 शतक लगा चुके हैं. इस लिस्ट में उन्होंने सचिन तेंदुलकर को पछाड़ा है. सचिन ने अपने वनडे करियर के दौरान 49 शतक लगाए थे. लेकिन 2023 वनडे वर्ल्ड कप के दौरान विराट कोहली ने सचिन का रिकॉर्ड ब्रेक कर दिया और अब कहीं आगे निकल गए हैं.
वनडे के अलावा भी टेस्ट और टी20 फॉर्मेट में भी विराट पीछे नहीं हैं. टेस्ट में 9 हजार से ज्यादा, T20 में 4 हजार से ज्यादा और IPL में भी 8 हजार से ज्यादा रन बनाकर विराट ने खुद को साबित किया है. ऐसे ही नहीं, विराट को रन मशीन कहा जाता है. जब भी उनका बल्ला चलता है, तो गेंदबाज अपनी खैर मनाते घूमते हैं. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता. हर बल्लेबाज के करियर में ऐसा दौर आता है, जब उसका बल्ला थम सा जाता है. रन नहीं निकलते. लोग सवाल उठाने लगते हैं, आलोचना करने लगते हैं. करियर पर सवाल उठाने लगते हैं पर, विराट ने उन परिस्थितियों से भी खुद को बाहर निकाला है.
विराट ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि साल 2014 में इंग्लैंड टूर के दौरान अच्छे रन नहीं बना पाने की वजह से मैं डिप्रेशन में चला गया था. करियर के दबाव ने कई बार मेंटल हेल्थ पर नेगेटिव इंपैक्ट डाला है. मैंने व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया है कि जब कमरे में ढेरे सारे मुझे चाहने वाले और प्यार करने वाले लोग बैठे हैं, उनके बीच भी मुझे अकेलापन फील हुआ. मुझे लगता है कि ये ऐसी चीज है, जिसके बारे में कई लोग महसूस करते होंगे. ये निश्चित तौर पर एक गंभीर मामला है और आप चाहें हर वक्त कितना भी मजबूत बनने की कोशिश करे लें, ये आपको अंदर से तोड़ सकता है. सभी एथलीट के लिए ये जरूरी है कि वो आराम करें और खेल के दबाव से रिकवर करें. साथ ही अपने आप को अपने अंतर्मन से जोड़े. अगर एक बार आपने ये कनेक्शन खो दिया तो फिर बाकी चीजों के बिखरने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
स्ट्रगल की एक और कहानी विराट एक शो में बताते हैं और कहते हैं कि पहली बार में मुझे स्टेट टीम में सेलेक्शन के दौरान रिजेक्ट कर दिया गया था. मुझे याद है, तब मैं रात भर रोता रहा. मैं काफी निराश था और मुझे रोते हुए रात को करीब 3 बज गए थे. मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि मैं रिजेक्ट हो गया हूं. मैंने सभी मैचों में अच्छा स्कोर किया था. सब कुछ अच्छा ही रहा था. लोग मेरे प्रदर्शन से खुश भी थे. मैंने हर स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन किया था. इसके बावजूद मैं रिजेक्ट हो गया. मैंने अपने कोच से इस बारे में 2 घंटे बात की थी. मुझे अब तक उस बारे में कुछ पता नहीं चल सका. मेरा मानना है कि जहां धैर्य और प्रतिबद्धता होती है, वहां प्रेरणा अपने आप आती है और सफलता भी मिलती है.
ये बातें तो विराट कोहली ने खुद ही बताई हैं, लेकिन 2019 के बाद का वो दौर भी याद कीजिए, जब कई सालों तक विराट कोहली के बल्ले से कोई शतक नहीं निकला तो कैसे कई तरह के सवाल खड़े होने लगे. उस वक्त भी विराट को मेंटली बुरे दौर से गुजरना पड़ा होगा. पर कहते हैं कि रात कितनी भी गहरी क्यों न हो, सुबह जरूर होती है और विराट कोहली तो खुद ही जलता हुआ वो शोला हैं, जिसने अपनी रोशनी से न सिर्फ अपने आपको, बल्कि पूरे देश को मान-सम्मान की चमक दी है.