Sunetra Pawar vs Sharad Pawar: जो शरद पवार सोनिया गांधी को विदेशी बताकर साल 1999 में कांग्रेस से अलग होते हैं, नई पार्टी एनसीपी का गठन करते हैं, महाराष्ट्र की सियासत में एक नया विकल्प पेश करते हैं, उन्हें क्या पता था 85 साल की उम्र में वो दिन भी आएगा, जब बेटे की तरह मानने वाले अजीत पवार के गम में आंसू बहाने पड़ेंगे... भले ही अजीत पवार ने एनसीपी को तोड़कर अलग गुट बना लिया था, लेकिन परिवारिक स्तर पर दूरियां नहीं बनी थी, इसी मार्च महीने में दोनों गुट एक साथ हो सकते थे और अजीत पवार के निधन के बाद ये कोशिश भी शरद पवार ने की. दावा किया जा रहा है कि शरद पवार की मीटिंग भी होने वाली थी, लेकिन सुनेत्रा पवार ने पवार की चाल ऐसी भांपी और बीजेपी ने ऐसा प्लान बनाया कि ये दोनों परिवार अब लंबे वक्त तक एक नहीं हो पाएंगे...
पति की मौत के तीन दिन बाद ही सुनेत्रा पवार पार्टी की मीटिंग में पहुंचती हैं, पार्टी की ओर से नेता चुनी जाती हैं, तब सोशल मीडिया पर कई लोग लिखते भी हैं कि इन्हें सोनिया गांधी की तरह सियासत करनी चाहिए थी, जब पति की मौत के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी एक नहीं बल्कि कई बार ठुकरा दी, पर राजनीति का यही तो खेल है, यहां अर्थी उठती नहीं और सियासत का गुणा भाग बैठ जाता है, कौन किस ओर जाएगा, किसकी पार्टी का नेता कौन बनेगा, किसका भविष्य क्या होगा, ये सब तेरहवीं से पहले ही तय हो जाता है, और महाराष्ट्र में कुछ ऐसा ही हुआ...
अब सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम हो सकती हैं, पर ये फैसला इतनी जल्दबाजी में क्यों हुआ, इसे समझना होगा...अगर पार्टी का विलय होता तो शरद पवार जिस हिसाब की सियासत करते हैं, उसमें बीजेपी को मुश्किल हो सकती है, इसलिए सुनेत्रा के इस फैसले में बीजेपी की भूमिका भी बड़ी मानी जा रही है..
महाराष्ट्र की राजनीति और शरद पवार की सियासत को करीब से समझने वाले लोग कहते हैं, ''चाचा-भतीजे की लड़ाई अब बहू बनाम ससुर की लड़ाई बन गई थी, जहां सुनेत्रा पवार के पास दो विकल्प थे.'' पहला, सबकुछ भूलकर शरद पवार के साथ पार्टी का विलय करना, दूसरा- पार्टी की कमान अपने पास रखना. सुनेत्रा ने दूसरा विकल्प चुना, और इसका अंदाजा शरद पवार को 30 जनवरी की रात को ही हो गया था.
जब शरद पवार ने परिवार की बैठक बुलाई, पर उसमें न सुनेत्रा पहुंचीं, न उनके बेटे पार्थ और न जय...हालांकि सुबह शरद पवार से मिलने पार्थ पवार जरूर गए...जिसका मतलब ये हुआ कि सुनेत्रा अपने पति अजीत पवार की तरह ही सियासत अलग करना चाहती हैं, वो पार्टी सिंबल, मंत्रालय और नेतृत्व से कोई समझौता नहीं करना चाहतीं, पर परिवार से रिश्ते भी बनाए रखना चाहती हैं...यही बात अजीत पवार ने भी बरसों पहले कहीं थी कि पवार साहब हमारे लिए देवता हैं और इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन हर व्यक्ति का अपना समय होता है. 80 वर्ष की उम्र पार करने के बाद नए लोगों को अवसर दिए जाने चाहिए.
यानि नई एनसीपी में नए चेहरों को मौका मिलने की संभावना है, फिलहाल सुनेत्रा राज्यसभा सांसद हैं, पर जल्द ही उनके बारामती विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की भी चर्चा है...ऐसे में इनका बैकग्राउंड जान लेना भी जरूरी है...
कौन हैं सुनेत्रा पवार
महिलाओं को रोजगार देने के लिए इन्होंने टेक्सटाइल पार्क खोला, जहां 15 हजार महिलाएं काम करती हैं...लेकिन कहते हैं साल 2019 में जब इन्होंने बेटे पार्थ पवार को चुनाव लड़वाना चाहा तो परिवार में कलह की तो पारिवारिक कलह बढ़ने लगी, हालांकि तब इन्होंने इंटरव्यू में सफाई भी दी थी, 2024 के चुनाव में खुद इन्होंने अपनी ननद और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के खिलाफ चुनाव लड़ा, हालांकि तब ये जीत नहीं पाईं...और आज जब अजीत पवार का गुट एक नेतृत्व की आस में था, तो इन्होंने मुश्किल वक्त में मजबूत फैसला लिया, आप इनके इस फैसले पर क्या कहना चाहेंगे, अपनी राय दे सकते हैं...