CJP के सहारे यूपी की गद्दी तलाश रहे चंद्रशेखर? 40 घंटे से धरना देने की क्या है सच्चाई?

Rahul Jadaun 22 Jul 2026 01:11: PM 2 Mins
CJP के सहारे यूपी की गद्दी तलाश रहे चंद्रशेखर? 40 घंटे से धरना देने की क्या है सच्चाई?

नई दिल्ली: NEET पेपर लीक और CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के जंतर-मंतर आंदोलन के बीच नगीना सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर का संसद परिसर में बाबा साहेब की प्रतिमा के नीचे 40 घंटे से जारी धरना सुर्खियों में है। चंद्रशेखर इसे युवाओं के हक की लड़ाई बता रहे हैं, लेकिन क्या यह वाकई छात्रों के प्रति संवेदना है या फिर 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं को साधने की एक सोची-समझी सियासी रणनीति? आंदोलन के घटनाक्रम पर गौर करें तो कई ऐसे गंभीर सवाल खड़े होते हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है।

  1. "जितनी भीड़ कहो बुला दूँ..." फिर क्यों नहीं आए समर्थक?

आंदोलन के दौरान का एक वाकया चर्चा में है, जब चंद्रशेखर ने आंदोलनकारी अभिजीत दीपके से बातचीत में कहा था कि "यहाँ कितने लोगों को प्रदर्शन के लिए बुलाना है, मैं बुला सकता हूँ।" लेकिन जमीनी सच्चाई यह रही कि उनके इस दावे के बाद भी वहाँ उनकी समर्थकों की वो भीड़ नज़र नहीं आई। राजनीतिक हलकों में संभावना जताई जा रही है कि क्या यह बयान सिर्फ आंदोलनरत युवाओं को प्रभावित करने और अपनी पकड़ दिखाने के लिए दिया गया एक मौखिक आश्वासन मात्र था?

  1. सुबह के मुख्य मार्च से गायब क्यों थे चंद्रशेखर?

जब CJP और NEET अभ्यर्थी सुबह सड़क पर उतरकर अपना मुख्य मार्च निकाल रहे थे, तब एक जिम्मेदार जन-प्रतिनिधि के रूप में चंद्रशेखर वहाँ मौजूद क्यों नहीं थे? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोई बड़ा और जिम्मेदार नेता उस वक्त छात्रों के बीच खड़ा होता, तो शायद दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच का टकराव टल सकता था और लाठीचार्ज जैसी स्थिति न बनती।

  1. लाठीचार्ज के बाद एंट्री: क्या यह 'सिंपेथी कार्ड' है?

सबसे बड़ा सवाल आंदोलन की 'टाइमिंग' पर उठ रहा है। जब सुबह का संघर्ष बीत गया और पुलिस कार्रवाई के बाद माहौल तनावपूर्ण व भावुक (Sympathetic) हो गया, तब चंद्रशेखर आजाद की एंट्री होती है। इसके बाद वे सीधे संसद परिसर में धरने पर बैठ जाते हैं। क्या यह आंदोलन में छात्रों के दर्द को बांटना था या फिर पुलिस कार्रवाई से उपजी सहानुभूति को भुनाकर अपनी 'स्ट्रीट फाइटर' छवि को मजबूत करने का जरिया?

  1. यूपी 2027 और 'युवा वोटबैंक' पर नज़र

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती के बीच चंद्रशेखर खुद को युवाओं के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में पेश करना चाहते हैं। छात्र राजनीति और पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर फ्रंट-फुट पर आकर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे बाकी नेताओं की तरह सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। लेकिन जिस तरह से इस धरने में जमीनी भीड़ के बजाय बयानों और मीडिया कवरेज पर जोर दिखा, उसने इस आंदोलन के पीछे की मंशा पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

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