मुंबई: मुंबई और पुणे की सड़कों पर रोजी-रोटी कमाने निकले ऑटो-टैक्सी चालकों के सामने आज सबसे बड़ा संकट भाषा की पहचान बन चुका है। पेट की आग बुझाने के लिए 14-14 घंटे ऑटो चलाने वाले यूपी और बिहार के गरीब ड्राइवरों को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वे धाराप्रवाह मराठी नहीं बोल पाते।
सड़क पर खौफ का माहौल
पिछले कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जहां क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ता ऑटो चालकों को रोककर उनसे मराठी में सवाल-जवाब करते हैं। जवाब न मिलने पर बदसलूकी, मारपीट और ऑटो पर तोड़फोड़ की घटनाएं आम हो चुकी हैं। रोजी-रोटी कमाने निकले ये आम नागरिक अब डर के साए में जीने को मजबूर हैं।
नोटिस का खेल और सख्त नियम
इस पूरे विवाद की जड़ में केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सख्ती भी है:
इस सियासत के पीछे कौन?
चुनावी समीकरण और स्थानीय 'भूमिपुत्र' की राजनीति को हवा देने के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और कुछ अन्य क्षेत्रीय गुट लगातार इस मुद्दे को गरमाते रहे हैं। चुनाव नजदीक आते ही प्रवासियों को 'सॉफ्ट टारगेट' बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का यह पुराना फॉर्मूला बन चुका है।
संकट में सबसे आगे खड़े रहे उत्तर भारतीय
आरोप लगाने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि जब भी महाराष्ट्र पर कोई विपदा आई, उत्तर भारतीयों ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है:
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) देश के हर नागरिक को भारत में कहीं भी काम करने और आजीविका कमाने की आजादी देता है। मराठी भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन भाषा के नाम पर गरीब की थाली से रोटी छीनना और डर का माहौल बनाना किसी भी सभ्य समाज के लिए सही नहीं हो सकता।