महाराष्ट्र में 'मराठी' के नाम पर घमासान: यूपी-बिहार के ड्राइवरों पर एक्शन के पीछे कौन? चौंका देंगे आंकड़े

Rahul Jadaun 24 Aug 2026 02:08 PM 2 Mins
महाराष्ट्र में 'मराठी' के नाम पर घमासान: यूपी-बिहार के ड्राइवरों पर एक्शन के पीछे कौन? चौंका देंगे आंकड़े

मुंबई: मुंबई और पुणे की सड़कों पर रोजी-रोटी कमाने निकले ऑटो-टैक्सी चालकों के सामने आज सबसे बड़ा संकट भाषा की पहचान बन चुका है। पेट की आग बुझाने के लिए 14-14 घंटे ऑटो चलाने वाले यूपी और बिहार के गरीब ड्राइवरों को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वे धाराप्रवाह मराठी नहीं बोल पाते।

सड़क पर खौफ का माहौल

पिछले कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जहां क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ता ऑटो चालकों को रोककर उनसे मराठी में सवाल-जवाब करते हैं। जवाब न मिलने पर बदसलूकी, मारपीट और ऑटो पर तोड़फोड़ की घटनाएं आम हो चुकी हैं। रोजी-रोटी कमाने निकले ये आम नागरिक अब डर के साए में जीने को मजबूर हैं।

नोटिस का खेल और सख्त नियम

इस पूरे विवाद की जड़ में केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सख्ती भी है:

  • मराठी की अनिवार्यता: परिवहन विभाग (RTO) के नियमों के तहत परमिट रिन्यूअल के लिए स्थानीय भाषा (मराठी) का बुनियादी ज्ञान जरूरी किया गया है।
  • हजारों नोटिस जारी: अकेले मुंबई, ठाणे और पुणे क्षेत्र में पिछले कुछ महीनों के भीतर 12,000 से अधिक ऑटो और टैक्सी चालकों को भाषा सत्यापन और स्थानीय नियमों के अनुपालन के नाम पर नोटिस थमाए जा चुके हैं।
  • परमिट रद्द होने की तलवार: कई ड्राइवरों के बैच और परमिट नवीनीकरण को सिर्फ भाषा परीक्षण में असफल होने के कारण अटका दिया गया है, जिससे हजारों परिवारों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है।

इस सियासत के पीछे कौन?

चुनावी समीकरण और स्थानीय 'भूमिपुत्र' की राजनीति को हवा देने के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और कुछ अन्य क्षेत्रीय गुट लगातार इस मुद्दे को गरमाते रहे हैं। चुनाव नजदीक आते ही प्रवासियों को 'सॉफ्ट टारगेट' बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का यह पुराना फॉर्मूला बन चुका है।

संकट में सबसे आगे खड़े रहे उत्तर भारतीय

आरोप लगाने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि जब भी महाराष्ट्र पर कोई विपदा आई, उत्तर भारतीयों ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है:

  • 2005 और 2019 की मुंबई बाढ़: जब शहर पूरी तरह डूब गया था, तब इन्हीं यूपी-बिहार के ऑटो और टैक्सी चालकों ने अपनी गाड़ियों में पानी भरने की परवाह किए बिना लाखों फंसे हुए लोगों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाया और मुफ्त में खाना-पानी बांटा।
  • कोरोना काल का संघर्ष: जब महामारी में लोग घरों में बंद थे, तब दूध, सब्जी, फल की सप्लाई चेन और राशन पहुंचाने का जिम्मा इन्हीं उत्तर भारतीय कामगारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर संभाला था।
  • अर्थव्यवस्था की रीढ़: मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर मेट्रो निर्माण, कंस्ट्रक्शन साइट्स, स्ट्रीट वेंडिंग और फल-सब्जी मंडियों तक, मुंबई को 24 घंटे चलायमान रखने में इस मेहनतकश तबके का सबसे बड़ा योगदान है।

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) देश के हर नागरिक को भारत में कहीं भी काम करने और आजीविका कमाने की आजादी देता है। मराठी भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन भाषा के नाम पर गरीब की थाली से रोटी छीनना और डर का माहौल बनाना किसी भी सभ्य समाज के लिए सही नहीं हो सकता।

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