Allahabad High Court: कुछ ही दिनों के अंतराल में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवाहित व्यक्तियों के लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दो महत्वपूर्ण और लगभग विरोधाभासी फैसले दिए हैं. 20 मार्च को जस्टिस विवेक कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसका जीवनसाथी जीवित है, तो वह बिना तलाक लिए किसी अन्य साथी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता. लेकिन कुछ दिनों बाद कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक अलग फैसले में कहा कि कोई विवाहित पुरुष किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो तो यह कानून के तहत अपराध नहीं है.
20 मार्च का फैसला: कोर्ट एक ऐसे दंपति की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें दोनों ही अलग-अलग लोगों से पहले से शादीशुदा थे. उन्होंने परिवार वालों की कथित धमकियों से सुरक्षा की मांग की थी. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और अपनी जान को खतरा महसूस कर रहे हैं. राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि दोनों की रिलेशनशिप गैरकानूनी है क्योंकि किसी ने भी तलाक नहीं लिया है.
कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील से सहमति जताते हुए सुरक्षा देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि भले ही दो सहमति वाले वयस्कों को जाति, धर्म या सामाजिक बाधाओं की परवाह किए बिना साथ रहने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है. बेंच ने जोर देकर कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता वैवाहिक जीवनसाथी के वैधानिक अधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकती.
कोर्ट ने टिप्पणी की, ''एक पति या पत्नी को अपने जीवनसाथी की संगति का कानूनी अधिकार है और इस अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर छीना नहीं जा सकता.'' कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे संबंधों को सुरक्षा प्रदान करना द्विविवाह से संबंधित अपराध को बढ़ावा देने जैसा हो सकता है. चूंकि याचिकाकर्ताओं को ऐसी स्थिति में कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं था, इसलिए कोर्ट रिट जारी करके उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकता. हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर दंपति को कोई हिंसा का खतरा हो तो वे पुलिस से सुरक्षा मांग सकते हैं.
कुछ दिनों बाद विरोधाभासी फैसला: इस फैसले के कुछ ही दिनों बाद, जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने एक अलग मामले में ज्यादा उदार व्याख्या अपनाई. यह मामला एक विवाहित पुरुष और 18 वर्षीय महिला से जुड़ा था. बेंच ने कहा कि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो तो यह कानूनी रूप से कोई अपराध नहीं है.
कोर्ट ने कहा, ''जहां एक विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो, वहां कोई अपराध नहीं बनता. नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना चाहिए.'' यह मामला तब सामने आया जब महिला के परिवार ने FIR दर्ज कराई कि उसे अगवा कर लिया गया है. लेकिन महिला ने पुलिस को बताया कि वह अपनी मर्जी से उस पुरुष के साथ रह रही है और अपने परिवार की धमकियों से डरती है.
पुलिस की निष्क्रियता पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा कि सहमति वाले वयस्कों की सुरक्षा करना अधिकारियों का कर्तव्य है. डिवीजन बेंच ने दंपति को अंतरिम सुरक्षा प्रदान की और आदेश दिया कि उनके खिलाफ कोई जबरदस्ती कार्रवाई न की जाए. साथ ही महिला के परिवार को उन्हें संपर्क करने या नुकसान पहुंचाने से रोका गया. कोर्ट ने स्थानीय पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी. कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, तो सामाजिक नैतिकता न्यायिक फैसलों का आधार नहीं बन सकती.
दोनों फैसलों का महत्व: ये दोनों फैसले विवाहित व्यक्तियों के लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानूनी स्थिति के विकसित होते और अभी भी अनिश्चित स्वरूप को उजागर करते हैं. एक बेंच ने विवाह की कानूनी पवित्रता और जीवनसाथी के अधिकारों को प्राथमिकता दी, जबकि दूसरी बेंच ने व्यक्तिगत स्वायत्तता और वयस्कों की सहमति से बने संबंधों में किसी विशिष्ट आपराधिक अपराध के न होने पर जोर दिया.