Prashant Kishor : जिस शख्स ने वर्षों तक दूसरों को चुनाव जिताने की रणनीति बनाई, अब उसने खुद जनता का जनादेश हासिल कर लिया है. यह जीत सिर्फ एक विधानसभा सीट की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सफर की है, जिस पर कभी सवाल उठाए गए थे.।प्रशांत किशोर का सफर भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा.
12वीं के बाद तीन साल तक पढ़ाई छोड़ दी. बाद में उच्च शिक्षा पूरी की और संयुक्त राष्ट्र से जुड़कर विकास परियोजनाओं पर काम किया, इसके बाद चुनावी रणनीति की दुनिया में कदम रखा और नरेंद्र मोदी के लिए रणनीति तैयार करने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. साल 2015 में बिहार में नीतीश कुमार की सत्ता में वापसी कराने वाली रणनीति हो, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की सरकार या तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की ऐतिहासिक जीत प्रशांत किशोर का नाम देश के सबसे सफल चुनावी रणनीतिकारों में गिना जाने लगा.
जब उन्होंने खुद राजनीति में उतरने का फैसला किया तो रास्ता आसान नहीं था. जन सुराज के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी के 238 में से 236 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके. विरोधियों ने कहा कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग खत्म हो गया. मगर उन्होंने हार नहीं मानी. बिहार के गांव-गांव में पदयात्रा की, संगठन खड़ा किया और जनता के बीच लगातार सक्रिय रहे.
आज उसी संघर्ष का परिणाम बांकीपुर की जीत के रूप में सामने है. यह सिर्फ एक विधायक बनने की कहानी नहीं है। यह उस रणनीतिकार की वापसी है, जिसने पहले दूसरों को सत्ता तक पहुंचाया और अब खुद बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा दी है. आने वाले दिनों में यह जीत बिहार की राजनीति के नए समीकरण तय कर सकती है.