मोदी को बहुमत से दूर रखने का प्लान अमेरिका में किसने बनाया था?

Global Bharat 05 Jun 2024 4 Mins 474 Views
मोदी को बहुमत से दूर रखने का प्लान अमेरिका में किसने बनाया था?

क्या मोदी को चुनाव हराने का प्लान दिल्ली या बंगाल में नहीं, बल्कि अमेरिका में बना था. नतीजों से दो दिन पहले रूस ने इतना बड़ा खुलासा किया कि सुनकर हर कोई दंग रह गया. उसने कहा भारत के चुनाव में अमेरिका का हाथ है. कपिल मिश्रा ट्वीट कर इसकी क्रोनोलॉजी समझाते हैं. इसकी क्रोनोलॉजी इतनी बड़ी है कि खुद को धुरंधर मानने वाले कई एक्सपर्ट भी हैरान हैं. ये टाइम्स ऑफ इंडिया का स्क्रिनशॉट है जो स्मृति ईरानी के हवाले से लिखता है.

जॉर्ज सोरोस भारत के लोकतंत्र को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, वो मोदी को टारगेट के लिए 1 बिलियन डॉलर यानि 8 हजार करोड़ रुपये का फंड भारत में मोदी विरोधी ताकतों को दे रहे हैं. खुद एक इंटरव्यू में पीएम मोदी ने कहा था ये जो विदेशी ताकतें हमारे चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर रही हैं ये ठीक नहीं हैं. तो सवाल उठता है कि क्या मोदी सिर्फ कांग्रेस, सपा, बसपा या तृणमूल कांग्रेस से लड़ रहे थे या फिर इनके पीछे जॉर्ज सोरोस का पूरा गैंग भी था, जिसने अमेरिका में जॉर्ज बुश की सरकार गिराने की कसम खाई थी, जो दुनियाभर में लोकतांत्रिक और मजबूत सरकारों को गिराने की साजिश रचते हैं.

लोकतांत्रिक देशों को गृहयुद्ध में झोंकने की फिराक में रहते हैं, ताकि उनकी विचारधारा दुनियाभर में बढ़ सके. आपको याद होगा चुनाव से दो साल पहले राहुल गांधी के साथ तेजस्वी यादव, मनोज झा, सीताराम येचुरी, सलमान खुर्शीद और महुआ मोइत्रा लंदन गए थे और वहां से लौटते ही तेजस्वी ने जातिगत जनणना की बात शुरू कर दी थी. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हमारे नेता विदेश कुछ सीखने जाते हैं, या वहां के लोगों से मिलकर उनकी विचारधारा भी बदल जाती है.

समझने वाली बात ये है कि दुनिया के कई देशों से भारत के रिश्ते जब मोदीराज में अच्छे हुए और मोदी का विदेशों में भव्य स्वागत भी होता है तो सोरोस जैसे लोगों को मोदी से इतनी दुश्मनी क्यों है और भारत की चुनावी व्यवस्था की जब दुनिया मिसाल देती है तो उसे कोई कैसे प्रभावित कर सकता है. इसे समझने के लिए आपको भारत की बढ़ती ताकत को समझना होगा.

भारत का आगे बढ़ना दुनिया को बर्दाश्त नहीं हो रहा है, पीएम मोदी जिस हिसाब से मेड इन इंडिया को प्रमोट कर रहे हैं उससे दुनियाभर के कुछ लोगों को पीड़ा हो रही है. वो सोच रहे हैं कि भारत ही सामान बनाएगा तो हम अपना सामान बेचेंगे कहां. सरकार ने डिफेंस के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने वाले कई फैसले लिए हैं, जिससे अमेरिका जैसे देश परेशान हैं कि भारत अगर दुनिया को हथियार बेचेगा तो हम क्या करेंगे.

हालांकि इससे इतनी बड़ी चोट पश्चिमी देशों को नहीं लगी थी, असल चोट तब लगी जब जयशंकर को दूसरे कार्यकाल में मोदी ने विदेश मंत्री बनाया औऱ जयशंकर ने साफ कहा कि हम अमेरिका हो या कोई और देश उसकी दादागिरी नहीं सहेंगे, अपने मुताबिक फैसले लेंगे, रूस से तेल लेना हो या ईरान में चाबहार डील करना हो, हम अपने फायदे का सौदा करेंगे. हम अमेरिकी बैन पर ध्यान नहीं देंगे.

कहते हैं जयशंकर का यही मिजाज कई देशों को रास नहीं आया तो वो सिस्टम में घुसने चले आए. अब विदेशी यहां से चुनाव तो लड़ नहीं सकते तो किसी तरह से लोगों को प्रभावित करने के लिए अपना एजेंडा चलाया, जमकर पैसे बहाए, और मोदी को बहुमत से दूर रखने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए. इनकी कोशिश थी कि तीसरी बार मोदी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए, इसीलिए आपने देखा होगा, कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने ये तक कहा कि हम अमेरिका वाला टैक्स सिस्टम लाएंगे. पूरी प्लानिंग ऐसी लग रही था कि अमेरिका और दूसरे देशों में तैयार हो रही है, किसे क्या बोलना है, कितना बोलना है, कब बोलना है, और किस पर निशाना साधना है, सबकुछ स्क्रिप्टेड था.

पर जनता इस बात को नहीं समझ पाई, अब लोग ये कह रहे हैं कि हिंदू एकजुट होते तो ऐसा नहीं होता, कोई कह रहा है मोदी सरकार को पहले सोचना चाहिए था. हर कोई हार पर अपनी-अपनी राय दे रहा है, लेकिन सतीश चंद्र मिश्रा लिखते हैं कि दो दिन पहले रूस ने खुलासा किया कि भारत के चुनाव में अमेरिका का हाथ है और मोदी को हटाने के लिए सोरोस ने जो फंडिंग की है. उसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए.

मोदी सरकार में मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने खुद ये कहा था कि इजरायली संस्था STOIC ने भारत के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की है. अगर इतनी बड़ी ताकतें लगी थी तो ये साफ समझिए कि मोदी की लोकप्रियता अगर इतनी नहीं होती तो बीजेपी की इतनी सीटें जीतना भी मुश्किल था और ये सब इसलिए हुआ क्योंकि विदेशी ताकतों को ये बात समझ आ गई थी कि मोदी के पास जब तक बहुमत है. अपनी बातें मनवाना मुश्किल है, पैसा कमाना मुश्किल है, भारत में अपना एजेंडा चलाना मुश्किल है. यही कारण था मोदी हर भाषा में इंटरव्यू दे रहे थे, जीतोड़ रैलियां कर रहे थे, ताकि जनता को ये बता पाएं कि कैसी प्लानिंग चल रही है.