नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को जेल में बंद गैंगस्टर अबू सलेम की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने बड़े भाई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में परिवार से मिलने के लिए इमरजेंसी पैरोल मांगी थी. जस्टिस ए.एस. गडकरी और एस.सी. चंदक की बेंच ने कहा कि सक्षम अधिकारियों के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, इसलिए सलेम की याचिका को मेरिट पर खारिज कर दिया गया.
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कोर्ट ने नोट किया कि अधिकारियों ने पहले ही सलेम को पैरोल पर रिहा करने की अनुमति दे दी थी, लेकिन इस शर्त के साथ कि उन्हें हाई-सिक्योरिटी पुलिस टीम द्वारा एस्कॉर्ट किया जाएगा और एस्कॉर्ट का पूरा खर्च वह खुद वहन करेगा. एक पहले की सुनवाई में बेंच ने स्पष्ट कर दिया था कि खर्च को लेकर कोई समझौता नहीं होगा. सलेम के वकील फरहाना शाह ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल एस्कॉर्ट चार्जेस (लगभग 17 लाख रुपये) वहन नहीं कर सकते.
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उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी शर्त लगाना वास्तव में पैरोल को नकारना ही है. विरोध करते हुए एडिशनल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर आशीष सातपुते ने कहा कि अधिकारियों ने एक्सट्राडिशन ट्रीटी (जिसके तहत सलेम को भारत लाया गया था) और पुलिस की प्रतिकूल रिपोर्ट (जिसमें कानून-व्यवस्था की चिंता जताई गई थी) को ध्यान में रखकर संतुलित फैसला लिया है. उन्होंने कहा कि सलेम जिन अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहते थे, वो पहले ही हो चुके हैं.
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साथ ही, अगर एस्कॉर्ट तैनात की गई तो राज्य को शुरू में काफी खर्च उठाना पड़ेगा. शाह ने पुलिस द्वारा बताई गई कानून-व्यवस्था की चिंताओं पर सवाल उठाया और कहा कि उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट में कोई ठोस सामग्री नहीं है जो यह दिखाए कि सलेम के आने से सार्वजनिक शांति भंग होगी. उन्होंने बताया कि सलेम पिछले करीब 25 साल से हिरासत में हैं और पहले तीन बार कोर्ट केस से जुड़े कामों के लिए बाहर ले जाया गया था, लेकिन उन्होंने कोई शर्त तोड़ी नहीं. साथ ही 2009 और 2011 में उन्हें अपनी मां और मौसी के अंतिम संस्कार में शामिल होने की इजाजत दी गई थी.
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शाह ने दोहराया कि सलेम केवल भाई के अंतिम संस्कार के रस्म निभाने के लिए पैरोल मांग रहे हैं, न कि किसी उत्सव के लिए, और वे इतना ऊंचा खर्च नहीं उठा सकते. हालांकि, कोर्ट ने सलेम के जेल प्रमाणपत्र (जिसमें 23 साल से ज्यादा की सजा दिखाई गई), पुलिस महानिदेशक द्वारा दाखिल हलफनामे (जिसमें गंभीर अपराधों का जिक्र है) और प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट (जिसमें चेतावनी दी गई कि उनकी मौजूदगी आजमगढ़ जिले के सराय मीर इलाके में शांति भंग कर सकती है) को ध्यान में रखा.
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कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने पहले ही सख्त शर्तों के साथ पैरोल मंजूर की थी और उन शर्तों को ढीला करने या समीक्षा करने का कोई आधार नहीं है. इसलिए याचिका में मेरिट नहीं पाई गई और इसे खारिज कर दिया गया.