2050 तक आधी दुनिया में पड़ेगी भयंकर गर्मी, 2 डिग्री तक बढ़ जाएगा तापमान, भारत पर क्या होगा असर?

Amanat Ansari 04 Feb 2026 07:29: PM 2 Mins
2050 तक आधी दुनिया में पड़ेगी भयंकर गर्मी, 2 डिग्री तक बढ़ जाएगा तापमान, भारत पर क्या होगा असर?

नई दिल्ली: 2050 तक दुनिया में अत्यधिक गर्मी का खतरा बहुत बढ़ जाएगा. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन के मुताबिक, अगर वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच जाता है, तो उस समय तक दुनिया की लगभग आधी आबादी—करीब 3.79 अरब लोग—खतरनाक स्तर की गर्मी का सामना करेगी. यह संख्या 2010 के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा होगी, जब यह आंकड़ा सिर्फ 1.54 अरब (23%) था.

यह अध्ययन नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित हुआ है और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हीटवेव्स पर गहराई से रोशनी डालता है. विशेषज्ञ इसे 'साइलेंट किलर' कहते हैं, क्योंकि गर्मी धीरे-धीरे शरीर के तापमान नियंत्रण तंत्र को बिगाड़ देती है. पसीना आने जैसी शरीर की प्राकृतिक ठंडक प्रक्रिया फेल हो जाती है, जिससे हीट स्ट्रोक, सिरदर्द, चक्कर, थकान और यहां तक कि अंगों की विफलता जैसी जानलेवा स्थितियां पैदा हो सकती हैं. लक्षण अचानक नहीं दिखते, लेकिन असर गहरा और घातक होता है.

सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्र

  • एशिया: भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, फिलीपींस, लाओस
  • अफ्रीका: नाइजीरिया, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, दक्षिण सूडान
  • लैटिन अमेरिका: ब्राजील

इन इलाकों में आबादी बहुत ज्यादा है और कई लोगों के पास एयर कंडीशनिंग या अन्य कूलिंग साधन नहीं हैं. आर्थिक असमानता के चलते गरीब तबके सबसे ज्यादा जोखिम में रहेंगे, जहां मौतों की संख्या में भारी इजाफा हो सकता है. भारत जैसे देशों में पहले से ही लू से हजारों मौतें हो चुकी हैं, और रातें भी अब इतनी गर्म हो गई हैं कि शरीर को आराम नहीं मिल पाता. कई राज्य इसे पहले ही गंभीर समस्या मान चुके हैं.

ठंडे देश भी नहीं बचेंगे

यह धारणा गलत है कि सिर्फ उष्णकटिबंधीय देश प्रभावित होंगे. कनाडा, रूस, फिनलैंड जैसे ठंडे इलाकों में भी खतरा बढ़ेगा. वहां की इमारतें, घर और परिवहन व्यवस्था ठंड रोकने के लिए डिजाइन की गई हैं, न कि गर्मी से बचाव के लिए. ज्यादातर घरों में एसी नहीं होता, और अचानक आने वाली हीटवेव ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है. यहां तक कि यूरोप के कई हिस्सों में भी कूलिंग की कमी से हालात बिगड़ सकते हैं.

वैज्ञानिकों की चेतावनी और सुझाव

अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. जीसस लिजाना के अनुसार, बदलाव बहुत तेजी से आ रहे हैं. ज्यादातर असर 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पार करने से पहले ही दिखने लगेगा. इसलिए अनुकूलन (adaptation) की जरूरत तुरंत है. वे कहते हैं कि कूलिंग को अब लग्जरी नहीं, बल्कि बुनियादी मानव आवश्यकता मानना होगा. इसके लिए...

  • कम ऊर्जा खपत वाले, पर्यावरण-अनुकूल एयर कंडीशनर विकसित करें.
  • पैसिव कूलिंग तकनीक अपनाएं—जैसे सफेद छतें, बेहतर वेंटिलेशन, प्राकृतिक ठंडक वाली इमारतें.
  • शहरों में छायादार जगहें, पेड़-पौधे, जल निकाय और हरित इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाएं.
  • इमारतों और सार्वजनिक स्थानों को गर्मी से बचाव के लिहाज से तैयार करें.
  • यह एक वैश्विक आपातकाल है, खासकर विकासशील देशों के लिए जहां संसाधन कम हैं. अगर उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई, तो स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, बिजली की मांग और
  • रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी असर पड़ेगा. अब समय है कि दुनिया मिलकर सस्टेनेबल तरीके से इस चुनौती का सामना करे.
Global Warming Heat wave Temperature rise Tropical areas

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