नई दिल्ली: बंगाल में चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक गर्मी दिल्ली तक पहुंच गई. बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का काफिला सुप्रीम कोर्ट के गेट पर पहुंचा. उनका निशाना था, ''चुनाव आयोग और राज्य में चल रही चुनावी रोल की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR).'' ममता सुनवाई से काफी पहले पहुंच गई थीं. उन्होंने अपनी सिग्नेचर वाली सफेद साड़ी पहनी थी और कंधे पर काला शॉल ओढ़ा हुआ था. ममता ने कहा कि यह काला शॉल विरोध का प्रतीक है. उन्होंने दावा किया कि SIR से जुड़ी 100 से ज्यादा मौतें हुई हैं और वे प्रभावित परिवारों के साथ एकजुटता दिखा रही हैं.
उनके अंदाज में एक नयापन था, कदमों में जोश था, क्योंकि वे अपनी राजनीतिक लड़ाई को कोर्टरूम तक ले आई थीं. यह वाकई अभूतपूर्व था, ममता बनर्जी पहली मुख्यमंत्री बनीं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में खुद अपनी केस की पैरवी की. कोर्ट के गलियारों में वकीलों को पार करते हुए, कुछ झुककर प्रणाम कर रहे थे, कुछ फोन से फोटो खींच रहे थे. ममता बनर्जी ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े, अपने वकीलों और Z+ सुरक्षा कर्मियों के घेरे में मीडिया के सवालों से बचती हुईं आगे बढ़ीं.
कोर्टरूम में पहुंचकर शुरू में उन्हें पिटीशनर-इन-पर्सन के तौर पर फ्रंट रो में बैठने को कहा गया, लेकिन उन्होंने अपनी वकील के साथ पीछे की विजिटर्स गैलरी में बैठना पसंद किया, जब तक उनका मामला कॉल नहीं हुआ. सुरक्षा कर्मियों ने इलाके को घेर लिया और कोर्टरूम में ममता के साथ सेल्फी लेने की कोशिश करने वालों के फोन जब्त कर लिए. सुप्रीम कोर्ट का कोर्टरूम SIR मामले की महत्वपूर्ण सुनवाई देखने आए वकीलों से खचाखच भरा था.
शुरुआत में उम्मीद थी कि SIR का मामला जल्दी लिया जाएगा, खासकर भीड़ और ममता की मौजूदगी को देखते हुए. लेकिन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच ने पहले अन्य मामलों को लिया. लगभग दोपहर 12:45 बजे जब मामला कॉल हुआ, तो ममता TMC सांसद और सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी के साथ फ्रंट रो में चली गईं.
चारों तरफ लंबे-लंबे वकीलों के बीच छोटे कद की ममता ने फिर भी अपनी मौजूदगी मजबूती से महसूस कराई. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से भावुक अपील की कि ''पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की रक्षा करें.'' संवैधानिक पद पर बैठी व्यक्ति की शिष्टाचार के मुताबिक, ममता ने पहले अपने सीनियर वकीलों को कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दे रखने दिए. बीच-बीच में वे बंगाल सरकार के वकील देबांजन मंडल को फुसफुसाकर निर्देश देती रहीं.
जब चुनाव आयोग (ECI) के वकील ने कहा कि ''छोटी-मोटी स्पेलिंग गलतियों'' के लिए नाम नहीं हटाए जा रहे, तो ममता ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए कोर्ट से इजाजत मांगी कि वे खुद कुछ दलीलें रख सकें. हाथ जोड़कर मुख्यमंत्री ने कहा, ''वकील हमेशा केस लड़ते हैं, लेकिन जब सब खत्म हो जाता है और हमें न्याय नहीं मिलता, न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा होता है. मैं रवींद्रनाथ टैगोर का हवाला दे रही हूं.'' ''इसलिए मैं यहां हूं. मैंने ECI को छह पत्र लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.''
बेंच ने शुरू में सवाल किया कि बंगाल की कार्यकारी प्रमुख खुद क्यों पैरवी कर रही हैं. चीफ जस्टिस ने कहा, ''आपके पास देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों की पूरी टीम है जो राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही है.'' ममता ने जवाब दिया, ''मैं एक साधारण व्यक्ति के रूप में पेश हो रही हूं, पार्टी लीडर के रूप में नहीं.'' बेंच ने कहा, ''आप कुछ और करने की कोशिश कर रही हैं,'' तो ममता बोलीं, ''मैं यहां एक लिटिगेंट के रूप में हूं.'' उन्होंने कहा, ''आप कह सकते हैं कि मैं कम महत्वपूर्ण व्यक्ति हूं, एक साधारण परिवार से बंधुआ मजदूर हूं. मैं बंगाल की निवासी हूं, इसलिए यहां हूं.''
पास खड़े कल्याण बनर्जी ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया. चीफ जस्टिस ने कहा, ''कोई आपकी निवासी होने से इनकार नहीं कर सकता, मैडम,'' और फिर मुख्यमंत्री को अपनी दलीलें रिकॉर्ड पर रखने की इजाजत दी. मीडिया से बातचीत में सीनियर एडवोकेट संजॉय घोष ने सुनवाई को अभूतपूर्व बताया. उन्होंने कहा कि एक बैठी हुई मुख्यमंत्री खुद कोर्ट में आर्ग्यूमेंट कर रही है. घोष ने कहा कि यह अभूतपूर्व था, और कोर्ट व मुख्यमंत्री दोनों को सराहना मिलनी चाहिए कि कार्यवाही की गरिमा बनी रही. कोर्ट ने नियमित प्रक्रिया की सर्वोच्चता जताई, जबकि मुख्यमंत्री ने अपनी शिकायत पूरी तरह रखी.
अपनी दलीलों में ममता ने कहा कि SIR प्रक्रिया को सिर्फ डिलीशन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वेरिफिकेशन और मैपिंग के लिए नहीं. उन्होंने आरोप लगाया कि BJP शासित राज्यों से लाए गए माइक्रो-ऑब्जर्वर, जो बंगाली नहीं समझते, बंगाली से अंग्रेजी में गलत अनुवाद को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी बताकर वोटर हटा रहे हैं. ममता ने कहा कि कोर्ट के पहले निर्देश पर लोग खुश थे जब Aadhaar, डोमिसाइल सर्टिफिकेट आदि स्वीकार किए गए थे, लेकिन बाद में ECI ने इन्हें ठुकरा दिया. ''केवल चुनाव से पहले बंगाल को निशाना बनाने के लिए.''
उन्होंने पूछा, ''24 साल बाद, चार महीने में क्या जल्दबाजी थी जो दो साल में होना चाहिए था वो भी फसल कटाई, पूजा के सीजन में, जब लोग शहर में नहीं होते?. उन्होंने अखबार की रिपोर्ट्स और फोटो दिखाते हुए 150 से ज्यादा BLOs (बूथ लेवल ऑफिसर) की मौतों का जिक्र किया, खासकर सुसाइड से. उन्होंने कहा कि बंगाल को क्यों टारगेट किया? असम में क्यों नहीं शुरू किया? नॉर्थईस्ट में क्यों नहीं?” उन्होंने प्रक्रिया को एंटी-विमेन बताया.
शादी के बाद महिलाओं के सरनेम या एड्रेस बदलने पर मिसमैच दिखाया जा रहा है. काम के लिए शिफ्ट होने वालों को भी डिलीट कर दिया जा रहा है.
ममता ने आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर ECI ऑफिस में बैठे फैसले ले रहे हैं. उन्होंने इलेक्शन कमीशन को व्हाट्सएप कमीशन कहा. जब ECI के वकील ने राज्य सरकार पर नॉन-कोऑपरेशन का आरोप लगाया, तो ममता ने तीखा जवाब दिया. उन्होंने कहा कि SDM और क्लास II ऑफिसरों की संख्या जिले पर निर्भर करती है और राज्य ने सभी उपलब्ध अफसर दिए हैं.
सुनवाई के अंत में CJI ने नोटिस जारी किया, ECI से जवाब मांगा और राज्य की एग्जीक्यूटिव हेड को ऑफिसरों की पर्याप्त डेपुटेशन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. ममता ने तुरंत सिर हिलाकर आश्वासन दिया. सुनवाई के बाद ममता फिर वकीलों और मीडिया से घिर गईं. एक वकील ने उन्हें अपनी किताब भी भेंट की. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए जिसमें कई वकील उन्हें कार तक फॉलो कर रहे थे. कोर्टरूम में जो ड्रामा हुआ, उससे ममता बनर्जी ने सुनिश्चित किया कि बंगाल की चुनावी लड़ाई अब सड़कों या राजनीतिक मैदान तक सीमित नहीं रहीय. यह देश की सर्वोच्च अदालत के सामने आ गई है.