नई दिल्ली: अदाणी समूह की एक और नई पहल ने रोजगार पाने की राह आसान की है. अब तक जहां अदाणी एनर्जी सॉल्यूशन लिमिटेड घर-घर रौशनी पहुंचाने के मिशन में लगी हुई थी, अब फील्ड में काम करने वाले जरूरी मैन पावर को ट्रेनिंग देने का काम भी करेगी. ट्रेनिंग देने के इस मिशन को नाम दिया गया है ‘लाइट इंडिया प्रोजेक्ट’, मतलब भारत में रौशनी फैलाने की परियोजना. यह ट्रेनिंग प्रोग्राम झारखंड के गोड्डा में अदाणी पावर प्रोजेक्ट के पास ही शुरू हुआ है.
हजारों की जरूरत, चंद ही मौजूद
इस मिशन के पीछे अदाणी का उद्देश्य उन लोगों को ट्रेनिंग देना है जो देशभर में इलेक्ट्रिफिकेशन के काम को तेजी से कर सके. बिजली के वितरण के लिए सबसे जरूरी काम उन टावरों को लगाने का है जिन पर हाई टेंशन तारों को बिछाया जाता है. इन टावरों को लगाने के लिए खास तरह की दक्षता की जरूरत होती है. ऐसा काम करने वालों की संख्या फिलहाल बहुत सीमित है.
गैंग में होता है काम, लेकिन संख्या बहुत कम
टावर लगाने के काम में जिस कौशल की जरूरत है फिलहाल उसकी बहुत कमी है. यह काम एक खास समूह द्वारा किया जाता है, जिसे "गैंग" कहा जाता है. हर गैंग में 30-35 लोग होते हैं. कुल मिलाकर देशभर में, इस काम में लगभग 18,000-20,000 लोग (600-650 गैंग) लगे हुए हैं. ये लोग एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट में काम करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में जाते रहते हैं. टावर लगाने के ये प्रोजेक्ट खेतों, जंगलों, नदियों, नालों, राजमार्गों, कृषि भूमि आदि से होकर गुजरते हैं. जैसे-जैसे काम आगे बढ़ता है गैंग के सदस्य भी उस हिसाब से बदलते रहते हैं.

पिछले कुछ सालों में पावर ट्रांस्मिशन से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में जबरदस्त तेजी आई है. इस वजह से मौजूद मैन पावर नाकाफी साबित हो रही है. फिलहाल जितने लोग इस काम में लगे हैं जरूरत लगभग उससे दुगने लोगों की है. कम मैन पावर होने से कई प्रोजेक्ट वक्त से पीछे चल रही हैं.
ट्रेनिंग मिलने से बढ़ेगी देश में मैनपावर और कमाई
टावर लगाने का काम काफी खास है. इसके लिए खास कौशल की जरूरत हो है क्योंकि 40-70 मीटर और कभी-कभी इससे भी अधिक ऊँचाई पर काम करना होता है. "गैंग" के 90% से अधिक सदस्य पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड - तीन राज्यों से आते हैं. फिलहाल टावर निर्माण का काम पारंपरिक तरीके से अपने वरिष्ठ कर्मचारी के साथ मिलकर काम करके सीखे जाते हैं. इसलिए "गैंग" के सदस्य आमतौर पर एक ही गाँव या जिले से होते हैं.

एक ही परिवार के कई सदस्यों का एक साथ "गैंग" में काम करना सामान्य बात है. तीन महीने का इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में रहने-खाने और ट्रेनिंग का पूरा खर्च कंपनी वहन करती है, साथ ही 21,000 रुपये प्रति माह का वजीफा भी दिया जाता है. यहां पर काम करने की बारीकियां जैसे एक पूरे टावर को असेंबल और डिसअसेंबल करना सीखते हैं.
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद कोई भी 30-35 हजार रुपये प्रति माह की आमदनी आराम से कर सकता है. पहले बैच के 70 लोगों ने अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया है और उद्योग में शामिल हो गए हैं. फिलहाल अदाणी के पास हर साल 1,000 लोगों को ट्रेनिंग देने की क्षमता है.