नई दिल्ली: लंबी न्यायिक देरी के प्रभाव को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के एक हत्या मामले में 100 साल के एक बुजुर्ग को बरी कर दिया है. कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए और अपील के फैसले में असाधारण देरी का हवाला देकर यह फैसला सुनाया.
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जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने हमीरपुर की सत्र अदालत द्वारा 1984 में आजीवन कारावास की सजा पाए धनीराम की सजा को रद्द कर दिया. उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में 40 साल से अधिक समय तक लंबित रही थी. यह मामला 9 अगस्त 1982 को हमीरपुर जिले में गुंवा नामक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या से जुड़ा है, जो कथित तौर पर जमीन विवाद से संबंधित था.
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, मुख्य आरोपी मैकू ने गोली चलाई थी, जबकि धनीराम और एक अन्य व्यक्ति सत्तीदीन पर हमले को उकसाने का आरोप था. ट्रायल कोर्ट ने धनीराम और सत्तीदीन को साझा इरादे से हत्या के आरोप में दोषी ठहराया था. दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की और अपील लंबित रहने के दौरान उन्हें जमानत मिल गई थी. इसके बाद दशकों तक मामला अनसुलझा रहा. इस दौरान सत्तीदीन की मौत हो गई, जिससे धनीराम ही मात्र जीवित अपीलकर्ता रह गए.
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अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य आरोपित (गोली चलाने वाला) मैकू कभी गिरफ्तार ही नहीं हुआ. पीठ ने देखा कि अपील का इतना लंबा लंबित रहना और जीवित आरोपी की बहुत उम्र इन दोनों बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के केस में मौजूद कमियों की ओर भी इशारा करते हुए धनीराम को संदेह का लाभ दिया. सजा को रद्द करते हुए कोर्ट ने धनीराम को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
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कोर्ट ने उनकी जमानत बांड को निरस्त करने का आदेश दिया. यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में देरी को लेकर फिर से चर्चा छेड़ सकता है, खासकर उन पुराने मामलों में जो दशकों तक लंबित रहते हैं और जिनका आरोपी और पीड़ित परिवार दोनों पर गहरा असर पड़ता है.