नई दिल्ली: कांग्रेस ने असम और पश्चिम बंगाल में 390 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 21 सीटें जीतीं. इन 21 विजेताओं में से 20 मुस्लिम उम्मीदवार थे. केरल में, जहां कांग्रेस-led गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है, वहां इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) उसका प्रमुख सहयोगी है. क्या कांग्रेस नई मुस्लिम लीग बन गई है? यह सवाल गंभीर है. 2014 में लोकसभा चुनाव में भाजपा से मिली करारी हार के बाद कांग्रेस की एक आंतरिक रिपोर्ट में इसकी चेतावनी दी गई थी.
2026 विधानसभा चुनाव में असम और पश्चिम बंगाल दोनों जगह हिंदू वोटों का मजबूत समेकन (Consolidation) देखने को मिला. लेकिन ग्रैंड ओल्ड पार्टी, जो कभी विचारधाराओं और नेताओं के पूरे स्पेक्ट्रम को समाहित करती थी, अब अल्पसंख्यकों से इतनी निकटता क्यों दिखा रही है?
भाजपा ने हिंदू वोटर समेकन पर जोर दिया, तो कांग्रेस ने (Survival) की लड़ाई में सहयोगियों का चुनाव और अपनी रणनीति के जरिए मुस्लिम वोटरों की ओर अधिक झुकाव दिखाया. भाजपा इसे अल्पसंख्यक-तुष्टिकरण वाली पार्टी बताती रही है, और 2014 से ही कांग्रेस के खिलाफ काउंटर-पोलराइजेशन देखा जा रहा है.
असम में कांग्रेस ने पूर्व चुनावी गठबंधन किया और 126 में से 99 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 19 सीटें जीतीं. इनमें से 18 मुस्लिम विधायक हैं. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 292 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 2 जीतीं. दोनों विजेता मुस्लिम उम्मीदवार हैं. कांग्रेस मुस्लिम उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट देती है. असम में भाजपा ने मुख्य रूप से अपने सहयोगियों को मुस्लिम-बहुल इलाकों में उम्मीदवार उतारने दिए.
2021 के असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के साथ गठबंधन किया था, जो लोअर असम के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मजबूत है. बाद में कांग्रेस ने AIUDF से अलग हो गई क्योंकि उसे Electoral gains नहीं दिखे. अब अजमल खुद कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि वह "मुस्लिम लीग" बन गई है. कांग्रेस को मुस्लिम-तुष्टिकरण वाली पार्टी के रूप में देखा जाना 2014 में ही AK एंटनी की कमेटी में उजागर हुआ था, लेकिन पार्टी ने इन लाल झंडों को नजरअंदाज कर दिया.
कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 63 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जो TMC (47) से ज्यादा थे. केरल और असम में कांग्रेस और उसके सहयोगियों द्वारा उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों की स्ट्राइक रेट 80% से ऊपर रही.
बदरुद्दीन अजमल कांग्रेस को मुस्लिम लीग क्यों कह रहे हैं?
AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने असम चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "कांग्रेस मुस्लिम लीग बन गई है." यह हमला भाजपा की तरफ से नहीं, बल्कि कांग्रेस के पुराने सहयोगी AIUDF की तरफ से आया. अजमल के अनुसार, कांग्रेस ने AIUDF को छोड़कर खुद मुस्लिम वोटों को बेहतर तरीके से consolidate करने का विश्वास किया था. 2016 में (AIUDF गठबंधन से पहले) कांग्रेस ने 26 सीटें जीती थीं, जिनमें 15 मुस्लिम थे. 2024 लोकसभा में कांग्रेस ने असम की 3 सीटें जीतीं (1 मुस्लिम), AIUDF खाली हाथ रही. 2026 में कांग्रेस के 19 में से 18 मुस्लिम MLA बने.
2014 की AK एंटनी रिपोर्ट
2014 की हार के बाद पूर्व रक्षा मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता AK एंटनी की कमेटी ने चेतावनी दी थी कि कांग्रेस की अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति Perceived निकटता ने उसके सेकुलर चरित्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अंतोनी ने कहा था कि समाज के कुछ वर्गों को लगता है कि कांग्रेस कुछ समुदायों या संगठनों की ओर झुकी हुई दिखती है, हालांकि उसकी नीति "सभी के लिए समान न्याय" है. उन्होंने कहा कि अगर इस धारणा को दूर नहीं किया गया तो सांप्रदायिक ताकतें बढ़ेंगी.
आज अजमल द्वारा "मुस्लिम लीग" कहे जाने और मोदी-भाजपा के हमलों के साथ वह चेतावनी सही साबित होती दिख रही है. कांग्रेस, जो कभी जाति, वर्ग और समुदायों से परे छत्रछाया वाली पार्टी थी, आज अत्यधिक Polarised राजनीतिक माहौल में खुद को एक कोने में कैद कर चुकी है. चुनाव की लड़ाई में उसने खुद को एक संकीर्ण दायरे में ढाल लिया है.
यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ है कि अल्पसंख्यक समुदायों के उम्मीदवारों को मौका मिले, लेकिन कांग्रेस इस बुलबुले में फंसती जा रही है. वह भाजपा को Communal बताती है, लेकिन अपनी छवि और रणनीति खुद उसे इस बड़े सवाल के केंद्र में खड़ा कर रही है.