Husband wife dispute: पुणे की एक फैमिली कोर्ट में हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने सबको चौंका दिया. एक महिला ने अदालत में अपनी व्यथा रखते हुए कहा कि उसकी शादी के बाद भी उसका पति उसके साथ कभी शारीरिक संबंध नहीं बना सका. इस वजह से उनका वैवाहिक जीवन सिर्फ कागजी और नाममात्र का रह गया.
महिला ने बताया कि दोनों की शादी रजिस्टर्ड तरीके से हुई थी. परिवार वालों की पूरी सहमति थी और शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था. लेकिन शादी के बाद पति ने हमेशा दूरी बनाए रखी. महिला को लगा कि शायद शुरुआती शर्म या एडजस्टमेंट की समस्या है, जो समय के साथ ठीक हो जाएगी. लेकिन महीनों-बल्कि साल बीत गए, फिर भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया. पति ने कभी भी पति-पत्नी के रिश्ते को पूर्ण रूप से निभाने की कोशिश नहीं की. आखिरकार महिला थक-हारकर मायके लौट आई और कोर्ट का रुख किया.
सुनवाई के दौरान पति ने खुद लिखित बयान में स्वीकार कर लिया कि शादी के बाद दोनों के बीच कभी भी सहमति से शारीरिक संबंध नहीं स्थापित हो पाया. दोनों पक्षों की ओर से तथ्यों पर कोई विवाद नहीं था और पति ने अपनी ओर से गलती मान ली.
जज बी. डी. कदम ने मामले की गहराई से जांच की. हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में, जहां विवाह की मूल आवश्यकता (Consummation) पूरी नहीं हुई हो और दोनों पक्ष सहमत हों, तो लंबी बहस या गवाहों की जरूरत नहीं पड़ती. अदालत ने इसे आधार मानते हुए विवाह को पूरी तरह से निरस्त (Annulled) घोषित कर दिया.
यह फैसला काफी तेजी से सुनाया गया, क्योंकि दोनों तरफ से कोई विरोध या अतिरिक्त दावा नहीं था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शारीरिक और भावनात्मक निकटता है, जिसके अभाव में रिश्ता सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता है. इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वैवाहिक जीवन में आपसी समझ और पूर्ण सहमति कितनी जरूरी है.