नई दिल्ली: दुनिया भर में युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के बीच कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या कलयुग का अंत करीब है? सनातन ग्रंथों और भविष्यवाणियों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कलयुग के चरम पर पहुंचने के बाद महापरिवर्तन आएगा और सतयुग की पुनः स्थापना होगी. श्रीमद्भागवत पुराण और ओडिशा की प्रसिद्ध ‘भविष्य मालिका’ में युग परिवर्तन को लेकर चौंकाने वाले संकेत दिए गए हैं.
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार सतयुग की शुरुआत
श्रीमद्भागवत पुराण के 12वें स्कंध (अध्याय 2, श्लोक 24) में कहा गया है: “यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पती. एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति तत्कृतम्॥” अर्थ यह है कि जब सूर्य, चंद्रमा और गुरु (बृहस्पति) तीनों एक साथ ‘तिष्य’ यानी पुष्य नक्षत्र और एक ही राशि (कर्क राशि) में प्रवेश करेंगे, तब कृतयुग यानी सतयुग का आरंभ होगा. खगोलीय गणनाओं के अनुसार, ऐसा दुर्लभ संयोग साल 2038 के आसपास अपनी पूर्णता के करीब देखा जा रहा है.
भविष्य मालिका के डरावने संकेत
संत अच्युतानंद दास द्वारा रचित ‘भविष्य मालिका’ में कहा गया है: “वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी गुरुवार दिने, सेहि दिन कलयुग होइब संपूर्णे...” अर्थात् जब वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि गुरुवार को पड़ेगी, तब कलियुग अपना चक्र पूरा कर लेगा. उस दिन अभूतपूर्व और चमत्कारी घटनाएं घटित होंगी.
ग्रंथ में चेतावनी दी गई है कि महापरिवर्तन के चरम पर प्रकृति का भयंकर कोप देखने को मिलेगा. ‘उनचास मरुत’ यानी 49 प्रकार की विनाशकारी आंधी-तूफान चलेंगी. प्राकृतिक आपदाओं और युद्धों से पृथ्वी की आबादी का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है और केवल एक चौथाई हिस्सा ही सुरक्षित बच पाएगा, जो नए सतयुग की नींव रखेगा.
भगवान कल्कि का अवतार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब धरती पर पाप और अधर्म अपनी सीमा लांघ जाएगा, तब भगवान विष्णु कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे. वे दुष्टों का संहार करेंगे और पृथ्वी पर सत्य, शांति व भाईचारे वाला सतयुग पुनः स्थापित होगा. ये भविष्यवाणियां धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित हैं.