नई दिल्ली: अपनी लाल रंग की पोशाक, हाथों में त्रिशूल और अनूठे अंदाज के लिए जानी जाने वाली धर्मगुरु सुखविंदर कौर उर्फ 'राधे मां' लंबे समय के बाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने अपने ऊपर उठने वाले विवादों, लाल कपडे पहनने, पति और परिवार को त्यागने तथा श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले करोड़ों के चढ़ावे पर बेबाक जवाब दिया है।
"मैं संत नहीं, दुर्गा मां की अवतार हूँ..."
राधे मां ने खुद को संत या साध्वी कहे जाने पर सीधा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि वे किसी अखाड़े की पारंपरिक संत नहीं हैं, बल्कि उनके भक्तों के लिए वे मां दुर्गा का साक्षात रूप हैं। उन्होंने बयान दिया:
"मैं कोई संत या संन्यासी नहीं हूँ। मैं तो महामाई (देवी) की अवतार हूँ। जब भक्त मुझे देखते हैं, तो उन्हें मां भगवती का रूप नज़र आता है। जब लोग मेरे पास श्रद्धा से आते हैं और अपनी मर्जी से पैसे या सोने-चांदी के चढ़ावे चढ़ाते हैं, तो मैं किसी को मना कैसे कर सकती हूँ? मैं तो इसे भगवान का प्रसाद समझकर स्वीकार करती हूँ।"
पति और गृहस्थ जीवन त्यागने का सच
अपने निजी जीवन पर बात करते हुए सुखविंदर कौर (राधे मां) ने बताया कि बेहद कम उम्र (महज 17-18 साल) में उनका विवाह पंजाब के मुकेरियां के रहने वाले मोहन सिंह से हुआ था। जब उनके पति काम के सिलसिले में कतर (विदेश) चले गए, तब उन्होंने सिलाई-कढ़ाई का काम करके अपने बच्चों को संभाला।
राधे मां के मुताबिक, धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक मोह-माया से हटने लगा और उन्होंने ईश्वर की भक्ति का रास्ता चुन लिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पति और परिवार को किसी नफरत की वजह से नहीं छोड़ा, बल्कि देवी मां की भक्ति के बुलावे के कारण वे इस राह पर आ गईं।
"ग्लैमरस रूप और लाल कपड़ों" पर दी सफाई
हमेशा लाल और भड़कीले परिधानों में दिखने के सवाल पर उन्होंने कहा कि लाल रंग सुहाग, शक्ति और देवी मां का प्रतीक है। वे किसी संत की तरह भगवा या सफेद कपड़े नहीं पहनतीं क्योंकि वे खुद को शक्ति का रूप मानती हैं। उनके मुताबिक, जो भक्त उन्हें उपहार में महंगे कपड़े या जेवर देते हैं, वे उन्हें पहनकर भक्तों को ही प्रसन्न करती हैं।