गाजीपुर से 7 बार सांसद रहे अफजाल अंसारी इतने लाचार हो गए हैं कि चुनाव लड़ने के पैसे नहीं हैं. उनके आका या उनके सियासी हमदर्द उनकी मदद तो करना चाहते हैं लेकिन उन्हें डर है कि अगर ऐसा किया तो फिर बुरी तरह फंस जाएंगे. मुख्तार की तकरीबन 160 करोड़ की प्रॉपर्टी सरकार के कंट्रोल में है, जो बची हुई संपत्ति है वो भी लीगल पचड़े में पड़ी है. एक वक्त था जब मुख्तार हवाला के जरिए करोड़ों रुपये इधर-उधर कर देता था. अब वो रास्ता भी नहीं बचा.
पहले फोन कॉल करके मुख्तार लाखों करोड़ों रुपये बिजनेसमैन से वसूल लेता था. अब मुख्तार भी नहीं है तो वो रास्ता भी नहीं बचा. कहते हैं मुख्तार की कमाई पर आधारित नरक की दुनिया में हिस्सेदार पूरा परिवार था और परिवार में अफजाल अंसारी भी हैं. लेकिन सरकार के पास पूरे परिवार के खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं, वो सांसद का चोला पहनकर राजनीति करते रहे, बड़े नेता बनने की कोशिश करते रहे. लेकिन कहते हैं रावण को उस वक्त सबसे ज्यादा दुख हुआ था जब उसका बेटा मेघनाद मारा गया था. ऐसे ही गाजीपुर का ये परिवार मुख्तार के जाने के बाद छिप-छिपकर आंसू बहा रहा है, कैमरे पर भी बेचारा बनने की कोशिश कर रहा है.
ऐसा कहा जाता है कि नोटबंदी जब की गई थी तो उसके पीछे नरेन्द्र मोदी के तीन मकसद थे. पहला मकसद था नक्सलवाद की कमर तोड़ना, दूसरा मकसद था आतंकवाद की कमर तोड़ना और तीसरा मकसद था चुनाव में होने वाली पैसों की हेराफेरी रोकना, चुनाव से कुछ महीने पहले ही झारखंड के राज्यसभा सांसद धीरज साहू के घर से इतना पैसा पकड़ा गया कि कई बैकों से नोट गिनने वाली मशीनें मंगवानी पड़ी और कई मशीनें खराब भी हो गईं. दबी जुबान में कई लोग कहते हैं कि वो पैसा कांग्रेस के चुनाव लड़ने का फंड था, कांग्रेस या अफजाल अंसारी जैसे नेताओं की हालत इस चुनाव में इतनी बुरी है कि उनकी कमर आर्थिक तौर पर टूट चुकी है. और पहली बार कांग्रेस ने टिकट के बदले पैसे मांगे, ऐसी कई ख़बरें मीडिया में चल रही है.
पूर्वांचल में पूरा इलेक्शन मांस, मंदिरा और डांस पर आधारित होता है, चुनाव के पहले वाली रात बोरों से नोटों की गड्डियां निकाली जाती है, आसपास के ठेकों को टेंडर दिया जाता है कि इतनी पेटी चाहिए, और नेताओं के कार्यकर्ता रात में जोमेटौ ब्वॉय की तरह घर-घर जाकर डिलीवरी करते हैं, इसी धाधंली से पूरा चुनाव रातों-रात बदल जाता है. कहा ये भी जाता है कि एक बोतल वोडका, साथ में गुलाबी नोट का. लेकिन अफजाल के पास अब ये वाला रास्ता भी नहीं बचा है, क्योंकि अगर ऐसा करते योगी बाबा या उनकी पुलिस ने देख लिया तो जीत का रास्ते से ज्यादा जेल का रास्ता खुल जाएगा.
ऐसी चर्चाएं भी मीडिया में सामने आ रही हैं कि अफजाल अंसारी का नामांकन रद्द हो सकता है, क्योंकि अफजाल अंसारी को एक मामले में 4 साल की सजा सुनाई गई है, नियम के मुताबिक अगर किसी को 2 साल से ज्यादा की सजा हो जाती है तो फिर चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती है और ऐसा कई नेताओं के साथ हो चुका है, अफजाल ने इसके खिलाफ अपील भी दायर की है, लेकिन उसकी सुनवाई की तारीख नजदीक नहीं है, तो सवाल है कि क्या गाजीपुर को हिला देने वाला अंसारी परिवार इस बार चुनाव से भी बाहर होने वाला है.