हर तरफ इस बात की चर्चा तो जोर-शोर से हो रही है कि बीजेपी 370 सीटें जीतने का टारगेट लेकर चल रही है और इस बार एनडीए 400 पार का आंकड़ा छू लेगा. पर क्या आप जानते हैं कांग्रेस के नेताओं ने अपने लिए टारगेट क्या रखा है. राहुल गांधी ने अब मीटिंग में ये कहना छोड़ दिया है कि वो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, वो भी ये दावा करना भूल चुके हैं कि केन्द्र में कांग्रेस की सरकार 2024 में आएगी, तो सवाल है कि हजारों की किलोमीटर की यात्रा लेकर चल रहे राहुल मेहनत किसलिए कर रहे हैं, तो उसकी वजह भी समझ लीजिए. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर कहते हैं कि इस बार कांग्रेस अगर 50-55 सीटें जीत ले तो ये कोई बड़ा आंकड़ा नहीं होगा, 2019 चुनाव में जो इन्होंने 52 सीटें जीतीं थीं,उसमें ज्यादा फेरबदल की गुंजाइश मुझे नजर नहीं आती.
इसी के साथ प्रशांत किशोर ये भी कहते हैं कि बीजेपी 400 पार का आंकड़ा बिल्कुल भी नहीं पार कर पाएगी, टारगेट तो हर चुनाव में ये बड़ा रखते हैं, 2014 चुनाव के बाद हुए 8 चुनावों में इन्होंने ऐसे ही बड़ा टारगेट रखा था, पर जनता ने उसे पूरा नहीं होने दिया, बहुमत के साथ सरकार बनाना और अपने मन के हिसाब से सीटें जीतना दोनों अलग-अलग बातें हैं. अगर जमीनी राजनीति को देखकर आप भी सोचेंगे तो 400 पार का आंकड़ा थोड़ा मुश्किल जरूर दिखता है, पर असंभव नहीं है. इस लिहाज से देखें तो विपक्ष के पास सिर्फ 143 सीटें बचती हैं.
इन 143 सीटों में कम से कम 20 पार्टियां हैं. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने मिलकर पिछले चुनाव में 15 सीटें जीती थी. बिहार में आरजेडी पिछली बार तो ज्यादा नहीं जीती, पर इस बार नीतीश के पाला बदलने से खेल पलट सकता है. बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी ने पिछले चुनाव में बंपर सीटें जीती थी. वहां सीपीआई का भी गढ़ है. उसके बगल में ओडिशा में बीजेडी, फिर दक्षिण भारत में तेलंगाना की केसीआर की पार्टी बीआरएएस, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और मौजूदा मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी भी है. हालांकि इसका झुकाव बीजेपी के साथ ही दिखता है.
इसके अलावा केरल में लेफ्ट पार्टियों का वर्चस्व, कर्नाटक में कुमारस्वामी की जेडीएस और पंजाब की अकाली दल भी है. दिल्ली-पंजाब में आम आदमी पार्टी भी इस बार ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश में है, हालांकि इनमें से कई पार्टियां कांग्रेस के साथ इंडिया गठबंधन में है, पर अकेले कांग्रेस के लिहाज से देखें तो ये तो उसके लिए नुकसान ही है. ये बात राहुल गांधी भी जानते हैं इस चुनाव में मोदी लहर से ज्यादा मंदिर लहर है, और इसमें कांग्रेस का पार पाना मुश्किल है, इसलिए वो अपनी यात्रा दो उद्देश्य से लेकर चल रहे हैं.
पहला- जहां-जहां के कार्यकर्ता निराश है, उनसे मिलकर चुनाव से पहले उनमें जोश भर सकें, ताकि बूथ स्तर तक कांग्रेस को मजबूती मिले.
दूसरा- जिन राज्यों में कांग्रेस की पकड़ अच्छी है, वहां की सीटें भी हाथ से क्यों निकल रही है, इसकी समीक्षा खुद जाकर कर सकें.
यानि राहुल आगे की सोच रहे हैं, और इस चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने प्रशांत किशोर के सहयोगी सुनील कानूगोलू को सर्वे का काम सौंपा है, 28 फरवरी तक वो अपनी सर्वे रिपोर्ट कांग्रेस हाईकमान को सौंप सकते हैं, उसके बाद आगे की रणनीति तैयार होने वाली है, कहा जा रहा है कि सुनील की रिपोर्ट में पंजाब के सांसदों के बीच एंटी इनकंबेंसी की चर्चा है, ख़बर तो ये भी सामने आई है कि गुजरात के अहमद पटेल जो लंबे वक्त तक सोनिया के करीबी रही, जिन्हें कांग्रेस का चाणक्य समझा जाता था, उनकी बेटी मुमताज पटेल कांग्रेस हाईकमान से नाराज है. उनका कहना है कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन के बाद, भरूच सीट आप के खाते में जाने से यहां की जनता नाराज है, ये कांग्रेस का गढ़ रहा है, ऐसा करना ठीक नहीं होगा.
मुमताज के करीबी बताते हैं कि वो लंबे वक्त से डोर टू डोर प्रचार कर रही हैं, अगर ऐसा हुआ तो वो पार्टी का साथ भी छोड़ सकती हैं. जिससे गुजरात में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है. इसके अलावा कुछ मीडिया रिपोर्ट में तो ये तक दावे किए जा रहे हैं कि रायबरेली और अमेठी की जनता भी इस बार कांग्रेस से नाराज है. अमेठी की वो महिला जिसके घर जाकर राहुल ने खाना खाया था, उसके हवाले से बीबीसी अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि जब चुनाव के वक्त आते हैं, उन्होंने अपनी बहन के हाथ का खाना खाया था तो सूध लेने तो आते, मैं बहुत परेशानी में हूं, जैसे-तैसे गुजारा चल रहा है. गरीब हूं लेकिन दिल से गरीब नहीं हूं. अगर राहुल भइया चुनाव लड़ेंगे तो जितना मदद हो सकेगा करूंगी.
हालांकि कई लोग ये भी कहते हैं कि पहले कांग्रेसी था पर अब बीजेपी को वोट दूंगा, क्योंकि बीजेपी के स्थानीय नेता हर सुख-दुख में साथ देते हैं, कांग्रेस से कोई पूछने भी नहीं आता. मतलब अमेठी की जनता का मिजाज इस बार भी राहुल के खिलाफ जा सकता है. और जहां तक रायबरेली का सवाल है, जो सीट सोनिया गांधी ने छोड़ी है, वहां से प्रियंका लड़कर जीत हासिल कर पाएंगी या नहीं ये भी बड़ा सवाल है. क्योंकि वहां की जनता भी पहले की तरह कांग्रेस की समर्थक नहीं रही है.शायद इसीलिए पीएम मोदी 23 फरवरी को जब यूपी दौरे पर गए तो उन्होंने साफ-साफ कहा इस बार यूपी की जनता एनडीए को यहां की सारी सीटें जीता रही है.