Owaisi on the Bhojshala Verdict: धार भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने फिर से सियासी और धार्मिक बहस छेड़ दी है. अदालत ने ASI के लंबे सर्वेक्षण के नतीजों को मान्यता देते हुए पूरे परिसर को हिंदू मंदिर और प्राचीन संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्वीकार किया है. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की.
उन्होंने इसे बाबरी मस्जिद मामले के फैसले से जोड़ते हुए कहा कि दोनों में कई समानताएं नजर आती हैं. सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए ओवैसी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस आदेश को पलट देगा. उन्होंने दावा किया कि पिछले 700 साल से इस जगह पर नमाज पढ़ी जा रही है. उनका कहना है कि यह फैसला पूजा स्थल अधिनियम के खिलाफ है, क्योंकि इस कानून के तहत किसी पूजा स्थल का स्वरूप बदला नहीं जा सकता. ओवैसी ने ASI की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि विभाग ने इसे मस्जिद बताया था, इसलिए कोर्ट का फैसला गलत है.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इंदौर बेंच ने अपने आदेश में साफ किया कि विवादित परिसर का धार्मिक चरित्र देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर और राजा भोज कालीन संस्कृत विद्यापीठ के रूप में स्थापित है. अदालत ने यह भी माना कि यहां हिंदू पूजा-अर्चना का सिलसिला कभी रुका नहीं. ASI सर्वे में मिले सबूतों, जैसे मंदिर की दीवारों पर कमल, घंटियां, कलश, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत श्लोक और शिलालेख को कोर्ट ने मजबूत माना. इसके अलावा जमीन के नीचे मंदिर से जुड़े अवशेष और यज्ञकुंड भी मिले.
कोर्ट ने 2003 के ASI आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर पाबंदी लगाई गई थी और मुस्लिमों को नमाज की इजाजत दी गई थी. साथ ही, अगर मुस्लिम पक्ष चाहे तो सरकार से धार या आसपास किसी वैकल्पिक जगह पर मस्जिद के लिए जमीन मांग सकता है.
ASI रिपोर्ट पर भरोसा
हाईकोर्ट ने पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को भरोसेमंद बताते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और अदालत वैज्ञानिक प्रमाणों पर भरोसा कर सकती है. ऐतिहासिक दस्तावेज, खुदाई के नतीजे और सभी पक्षों की दलीलों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया.
अदालत ने सरकारों की जिम्मेदारी भी याद दिलाई कि उन्हें प्राचीन स्मारकों और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के साथ-साथ तीर्थयात्रियों की सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए. फैसले में ब्रिटिश म्यूजियम से देवी वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने के लिए सरकार को कदम उठाने की बात भी कही गई है. यह फैसला अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की संभावना के साथ चर्चा में बना हुआ है.