मां-बाप की आंखों में आंसू, बेटे के लिए मौत की दुआ, रुला देगी हरीश राणा की मार्मिक कहानी

Amanat Ansari 15 Mar 2026 09:08: PM 2 Mins
मां-बाप की आंखों में आंसू, बेटे के लिए मौत की दुआ, रुला देगी हरीश राणा की मार्मिक कहानी

Harish Rana Story: गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले अशोक राणा और निर्मला राणा के घर की खुशियां 2013 में एक हादसे के साथ हमेशा के लिए बदल गईं. उनका बेटा हरीश, जो उस समय चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया. इस दुर्घटना में उसे गंभीर सिर की चोट आई, जिसके बाद वह स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चला गया. तब से पिछले 13 सालों तक वह बिस्तर पर पड़ा रहा, न खुद कुछ कर पाया, न बोल पाया.

हरीश का जन्म 12 सितंबर 1993 को दिल्ली में हुआ था. घर का पहला बच्चा होने के कारण उसे खूब लाड़-प्यार मिला. बचपन में शरारती था, मां को डांटने पर कोने में छिप जाता, फिर चुपके से आकर गले लग जाता. हंसमुख स्वभाव का लड़का था, हमेशा मुस्कुराता और दूसरों को भी हंसाता. 12वीं दिल्ली से करने के बाद इंजीनियर बनने का सपना लेकर चंडीगढ़ चला गया था.

21 अगस्त 2013 का वह दिन परिवार के लिए काला दिन साबित हुआ. हादसे के बाद कई अस्पतालों में इलाज कराया गया, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. गले में ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब और पेट में पोषण के लिए PEG ट्यूब लगी रही. परिवार ने दिन-रात उसकी देखभाल की. छोटे बच्चे की तरह सफाई, बदलना, हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी करना. मां निर्मला रोज घाव साफ करतीं, पिता अशोक हर संभव कोशिश करते रहे. लेकिन समय के साथ देखभाल की जिम्मेदारी भारी पड़ने लगी.

बुजुर्ग होते शरीर में ताकत कम हुई, शरीर पर घाव बढ़े, इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए. यहां तक कि दिल्ली का तीन मंजिला मकान और जमीन बिक गई. हर महीने करीब 70 हजार का खर्च आता था. परिवार टूट चुका था, बेटे को पल-पल तड़पते देखना असहनीय हो गया था. आखिरकार उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

11 मार्च 2026 को कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. भारत में पहली बार किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी गई. कोर्ट ने कहा कि यह हरीश के बेस्ट इंटरेस्ट में है, क्योंकि ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची. जीवन रक्षक उपकरण खासकर क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन (CANH) चरणबद्ध तरीके से हटाए जा सकते हैं.

फैसले के बाद हरीश को दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया. यहां एनेस्थीसिया और पैलिएटिव केयर के विशेषज्ञों की एक मेडिकल कमिटी बनाई गई है, जिसमें कई विभागों के डॉक्टर शामिल हैं. कमिटी हरीश की स्थिति का मूल्यांकन कर रही है. अस्पताल में पैलिएटिव केयर वार्ड में रखा गया है, जहां दर्द या तकलीफ होने पर राहत दी जाएगी, लेकिन कोई एक्टिव इलाज या वेंटिलेटर सपोर्ट नहीं दिया जाएगा. प्रक्रिया धीरे-धीरे चलेगी, ताकि मौत प्राकृतिक और दर्दरहित हो.

मां निर्मला भावुक होकर कहती हैं कि बेटे को इतने सालों तक इस हालत में देखना असहनीय था. बचपन की यादें आंखों के सामने आती हैं, तो आंसू बह निकलते हैं. पिता अशोक कहते हैं कि बेटे को ऐसे जीते देखना मौत से ज्यादा तकलीफ देता था. अब वे भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिले.

परिवार ने सबको माफ कर दिया और हरीश से विदाई के पल में कहा सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ, ठीक है. यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि इंसानी दर्द, उम्मीद और गरिमापूर्ण मौत के अधिकार की भी है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा.

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