नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार को विपक्ष द्वारा संसद में उनके हटाए जाने के लिए प्रस्ताव लाने की नोटिस पर सवालों से बचते हुए कोई जवाब नहीं दिया. चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुमार ने इस विपक्षी नोटिस पर कोई टिप्पणी नहीं की.
जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को केवल संसद द्वारा हटाया जा सकता है, वहीं चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है. यह पहली बार है जब विपक्ष ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की नोटिस दी है.
विपक्ष का आरोप है कि वे पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं. विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर कई मौकों पर सत्तारूढ़ भाजपा की मदद करने का आरोप लगाया है, खासकर मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) के दौरान, जिसे वे केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा पहुँचाने की कोशिश बताते हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी है, यानी महाभियोग केवल "सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता" के आधार पर ही संभव है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से केवल उसी तरह और उसी आधार पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है, और नियुक्ति के बाद उनके सेवा शर्तों को उनके खिलाफ बदलना संभव नहीं है.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है, अर्थात सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत.