मध्य प्रदेश के रहने वाले कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा पर वृंदावन वाले स्वामी प्रेमानंद महाराज को गुस्सा क्यों आया और वो भी इतना भयंकर गुस्सा कि सीधा श्राप दे दिया. ये सुन लेंगे तो कहेंगे प्रदीप बाबा ने ठीक नहीं किया. हमेशा शांत रहने वाले और लोगों को सही सीख देने वाले प्रेमानंद महाराज ने भयंकर गुस्से में कहा है कि श्रीजी के विषय में बोलने से पहले बहुत होश में बोलना, तुम किस राधा की बात करते हो, राधा को जान जाओगे तो आंसुओं से वार्ता होती है, वाणी मूक हो जाती है.
कह रहा है कि बृषभानू कुल बरसाने में श्रीजी की उपस्थिति ही नहीं है, वो तो कभी-कभी. यहां क्या कह रहा है कि जो प्रकट हुईं सदा प्रकट हैं, लाडली जू महल में नित्य विराजमान हैं. नेत्र हैं उसके, कभी गया है बरसाने. क्या जानते हो तुम, कैसे तुम्हें बताऊं, कितने ग्रंथ पढ़ा है उसने, ये चापलूसी संसार वालों को तुम रिझा सकते हो, लेकिन कभी श्रीजी के विषय में कोई न बोले, कहीं ऐसा न समझे देख लेना वो किसी काम का नहीं रहेगा, ये श्राप नहीं है, परिणाम बोल रहा हूं, माइक से बोल रहा हूं, चिल्लाकर बोल रहा हूं, कोई नहीं बचा पाएगा उसे.
या तो जाए बरसाने साष्टांग दंडवत होकर घुटने टेक दे, मेरे से गलती हो गई आपकी महिमा को नहीं जानता. तो अत्यंत दयालु-कृपालु लाडली क्षमा. ऐसे तुम बोलना चाहो जो चाहो बोल लो कि राधारानी बहुत भोली-भाली हैं, हां हैं बहुत भोली, पर उनके सेवक ऐसे काल के भी महाकाल हैं, पिकदानी लिए खड़े रहते हैं श्रीकृष्ण. बहुत बड़ी ठेस पहुंची है हमारी हृद्य में. ऐसों को बैठाकर भागवत सुनोगे तो पुरखा नरक जाएंगे.
प्रेमानंद महाराज का गुस्सा देखकर भी पंडित प्रदीप मिश्रा अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं, बल्कि साफ कहा है कि मैंने जो बोला है वो प्रमाण के साथ बोला है, अगर प्रेमानंद महाराज बुलाते तो उनका ये दास वहां ऐसे ही चला जाता है. पूरी बात सुनकर आप समझ गए होंगे कि उनका गुस्सा उनके इष्ट राधारानी पर की गई गलत टिप्पणी को लेकर है.
दरअसल पंडित प्रदीप मिश्रा ने एक कथा में राधारानी को लेकर कुछ ऐसा कह दिया, जो किसी भक्त को स्वीकार नहीं होगा, पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा था 16 हजार पटरानी में राधा का नाम है, राधा के पति में कृष्ण का नाम है, राधा के पति का नाम है अनय घोष, सास का नाम था जटिला, ननद का नाम था कुटिला, विवाह हुआ था ग्राम-छाता में.
कहां की रहने वाली थी राधा- बरसाना, बरसाने की राधा नहीं थी, राधाजी थीं रावलगांव की, बरसाने में राधाजी की पिताजी की कचहरी थी, जिसमें राधा बरस में एक बार कचहरी पर जाती थी, इसीलिए उसका एक नाम है बरस में एक बार आना. बड़े-बड़े पुराणों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि राधारानी बरसाने की हैं, अब चूंकि दोनों बड़े बाबाओं ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं इसीलिए कई लोग कंफ्यूज हैं कि सच्चाई क्या है.
इंटरनेट पर कई ऐसे दावे हैं जिसमें बरसाने की बजाय राधारानी का जन्मस्थल रावल गांव बताया गया है, पर पंडित प्रदीप मिश्रा जैसे कथावाचक इंटरनेट के भरोसे इतनी बड़ी बात कह देंगे ये किसी को उम्मीद नहीं है.