नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर विपक्षी दलों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद बने तनावपूर्ण हालातों के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने लोकतंत्र और कानून के राज की रक्षा के लिए रविवार को भी अपने द्वार खोल दिए। प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि देश और संविधान की सेवा के लिए अदालतें सदैव तत्पर हैं। सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में वकीलों और सुरक्षा अधिकारियों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने रविवार को पीठ बैठने के लिए आभार व्यक्त किया, तब सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा—"हम देश की सेवा के लिए बैठे हैं।"
मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस जे. बागची की पीठ ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए। अदालत ने दो टूक टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस अधिकारियों को राज्य या संविधान से ऊपर कोई व्यक्तिगत अधिकार हासिल नहीं है।
जस्टिस बागची ने रेखांकित किया कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हर नागरिक के लिए समान रूप से संवेदनशील और सर्वोपरि है। चाहे वर्दी में तैनात पुलिस अधिकारी हों या सामान्य नागरिक, दोनों के मौलिक अधिकारों का महत्व एक बराबर है। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से सहयोग की अपेक्षा करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों और वकीलों की पीड़ा को अदालत तुच्छ या महत्वहीन नहीं मानती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दिल्ली के हालात को बेहद गंभीर बताया। सिब्बल ने दलील दी:
ट्रेनों से जबन उतारना: शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने आ रहे लोगों को जानबूझकर ट्रेनों से उतारा गया, जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों की अवमानना है।
चार किमी का दायरा व इंटरनेट बंदी: प्रदर्शन स्थल से चार किलोमीटर दूर तक आम नागरिकों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई और इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गईं। यह ऐतिहासिक 'अनुराधा भसीन' फैसले के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है।
45 से अधिक मेट्रो स्टेशन बंद: अदालत के पूर्व आदेशों के बावजूद दिल्ली के लगभग 45 से 47 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर राजधानी की लाइफलाइन ठप कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) की याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अपने साथ हुई घटना का ब्योरा दिया। उन्होंने अदालत को बताया कि राजधानी में दमनकारी माहौल इतना बढ़ गया था कि वकीलों तक को खड़े रहने की इजाजत नहीं थी और उन्हें बलपूर्वक चलती बस में फेंक दिया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल अधिवक्ताओं का नहीं, बल्कि हर भारतीय नागरिक के शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के मौलिक अधिकार का सवाल है।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने वीडियो साक्ष्यों के जरिए दावा किया कि जंतर-मंतर की तय सीमा से बाहर भी नागरिकों और बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ। उन्होंने बिना नेमप्लेट और पहचान चिह्न वाली वर्दी पहनकर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय करने, तुरंत बैरिकेड हटाने और मेट्रो सेवाएं बहाल करने की मांग की। वरिष्ठ अधिवक्ता हरिहरन और एक महिला वकील ने भी अदालत को बताया कि शांतिपूर्ण मार्च के दौरान अधिवक्ताओं को रेड लाइट से हिरासत में लेकर जेल वैन में ठूंस दिया गया, जिससे वकीलों की सामान्य आवाजाही तक बाधित हो गई। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें दर्ज कर ली हैं।