नई दिल्ली: बिहार की सियासत में इन दिनों लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव सुर्खियों में हैं. मकर संक्रांति के मौके पर वे 14 जनवरी को दही-चूड़ा भोज का आयोजन कर रहे हैं, और इसके लिए खुद कई बड़े नेताओं को निमंत्रण दे रहे हैं. इनमें बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा जैसे एनडीए के प्रमुख चेहरे शामिल हैं.
इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, सम्राट चौधरी और अन्य दलों के नेताओं को भी बुलावा भेजा जा रहा है. यहां तक कि छोटे भाई तेजस्वी यादव को भी औपचारिक न्योता देने की बात कही जा रही है. यह आयोजन पारंपरिक तौर पर सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है, लेकिन तेज प्रताप के हालिया कदमों से राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं.
2025 के विधानसभा चुनाव में अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल से लड़कर हार झेलने के बाद तेज प्रताप की एनडीए नेताओं से बढ़ती नजदीकियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं. चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने एनडीए की जीत पर बधाई दी थी, जबकि उनकी पैतृक पार्टी आरजेडी को बड़ा झटका लगा था. हाल ही में जेएनयू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ उठे विवादित नारों पर भी तेज प्रताप ने सख्त रुख अपनाया. उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को 'नासमझ' करार देते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल ठीक नहीं, क्योंकि युवा देश का भविष्य हैं और सरकार कार्रवाई कर रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिवार और पुरानी पार्टी से दूरी के बाद तेज प्रताप अपनी नई राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. चुनावी हार के बावजूद सरकारी सुविधाओं और आगे की राह के लिए एनडीए से अच्छे रिश्ते बनाना उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. दही-चूड़ा भोज को वे सौहार्द का माध्यम बता रहे हैं, लेकिन इससे सियासी खिचड़ी पकने की संभावनाएं भी खारिज नहीं की जा रही हैं. आने वाले दिन बताएंगे कि यह सिर्फ परंपरा है या कोई नया समीकरण बन रहा है.