नई दिल्ली: वैश्विक महाशक्तियों के बीच जारी शक्ति प्रदर्शन अब धरती की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष तक पहुँच गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक ऐतिहासिक और दुर्लभ स्वीकारोक्ति में पहली बार सार्वजनिक रूप से माना है कि उसने पृथ्वी की कक्षा (ऑर्बिट) में सक्रिय हथियार तैनात किए हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मींक (Troy Meink) ने 'एयर, स्पेस और साइबर कॉन्फ्रेंस' के दौरान इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि स्पेस फोर्स के पास ऐसे स्पेस-कंट्रोल हथियार मौजूद हैं, जो किसी भी प्रतिकूल हमले की स्थिति में अमेरिकी सेना और उसके सहयोगी बलों की सुरक्षा करने में सक्षम हैं।
पेंटागन के अनुसार, ये हथियार 'काइनेटिक' (भौतिक प्रभाव डालने वाले) और 'नॉन-काइनेटिक' (इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, लेजर या साइबर तकनीक) दोनों क्षमताओं से लैस हैं। इनका इस्तेमाल रक्षात्मक और आक्रामक दोनों अभियानों के लिए किया जा सकता है। हालांकि, रणनीतिक और सुरक्षा कारणों के चलते अमेरिकी अधिकारियों ने इन हथियारों के सटीक प्रकार, कुल संख्या और इनकी तैनाती की तारीख को गोपनीय रखा है।
अमेरिका ने इस अप्रत्याशित कदम के पीछे रूस और चीन की बढ़ती सैन्य अंतरिक्ष गतिविधियों को मुख्य वजह बताया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का दावा है कि रूस अंतरिक्ष को एक सक्रिय युद्ध क्षेत्र के रूप में देख रहा है और सैटेलाइट्स को नष्ट करने की तकनीक विकसित कर रहा है। वहीं, चीन भी तेजी से अपनी काउंटर-स्पेस और एंटी-सैटेलाइट क्षमताओं का आधुनिकीकरण कर रहा है। वर्तमान युद्ध नीतियों में संचार, मिसाइल ट्रैकिंग और नेविगेशन के लिए सैटेलाइट्स बेहद अहम हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' केवल सामूहिक विनाश (परमाणु) हथियारों पर रोक लगाती है, लेकिन पारंपरिक हथियारों पर स्पष्ट पाबंदी न होने से सुपरपावर्स इसका फायदा उठा रही हैं। अमेरिका के इस खुलासे के बाद अब रूस और चीन की ओर से भी जवाबी तैनाती की आशंका बढ़ गई है, जिससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और तेज हो सकती है।