नई दिल्ली : अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन की नीतियों को एक बार फिर बड़ा कानूनी झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने आगामी मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले डाक द्वारा मतदान (मेल-इन वोटिंग) पर नए कड़े प्रतिबंध और प्रक्रियागत बदलाव लागू करने की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद अब विभिन्न राज्य अपनी पूर्व निर्धारित व्यवस्था के तहत ही मतदाताओं को डाक मतपत्र भेज सकेंगे, जिससे लाखों अमेरिकी नागरिकों के मताधिकार पर बना संशय दूर हो गया है।
ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी डाक सेवा (USPS) के जरिए डाक मतपत्रों के लिए नए नियम तय करने की वकालत की थी। इसके तहत मतपत्रों के लिफाफों का नया मानकीकृत डिजाइन तैयार करने, हर मतदाता के लिए विशेष बारकोड अनिवार्य करने और राज्यों द्वारा पात्र मतदाताओं का डेटा ऑनलाइन पोर्टल पर साझा करने की शर्त रखी गई थी। प्रशासन का कहना था कि इन नियमों का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और सुरक्षा को बढ़ाना है। हालांकि, कई राज्यों और मतदान अधिकार संगठनों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ताओं और राज्य चुनाव अधिकारियों का मुख्य तर्क था कि मतदान की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और कई राज्यों में लाखों मतपत्र भेजे जा चुके हैं। ऐसे में ऐन वक्त पर बुनियादी नियमों में बदलाव करने से भारी प्रशासनिक अराजकता फैल जाएगी और तकनीकी खामियों के चलते लाखों वैध मतदाताओं के मतपत्र निरस्त हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए निचले न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक को बरकरार रखा।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका में करीब एक-तिहाई मतदाता डाक के जरिए मतदान करते हैं। ट्रंप लंबे समय से डाक मतदान प्रणाली का कड़ा विरोध करते रहे हैं और चुनावों में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते आए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश ने मिडटर्म चुनावों के बीच उनकी इस कानूनी मुहिम को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया है।