नई दिल्ली: 32 वर्षीय हरीश राणा, जो 13 साल पहले गिरने से गंभीर मस्तिष्क चोट लगने के बाद कोमा में हैं, को सुप्रीम कोर्ट ने मरने की अनुमति दे दी है. यह देश में पहला ऐसा मामला है जिसमें कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु का आदेश दिया है. यह फैसला 2018 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को आगे बढ़ाता है जिसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध माना गया था.
फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की भावुक बेंच ने सुनाया. आज का फैसला एक ऐतिहासिक निर्णय है क्योंकि यह 2018 के दिशानिर्देशों को आगे ले जाता है. यह मामला खास है क्योंकि मेडिकल राय से उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय है, लेकिन 2018 के दिशानिर्देशों में फीडिंग ट्यूब से जीवन सपोर्ट को शामिल नहीं किया गया था.
इसलिए पहले के नियम, जैसे वेंटिलेटर हटाना अस्पताल स्तर पर लागू नहीं हो पा रहे थे. इसी वजह से हरीश राणा के माता-पिता कोर्ट गए थे. उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, जहां आज कोर्ट ने अस्पताल में मेडिकल ट्रीटमेंट हटाने की अनुमति दी, जिससे 32 वर्षीय हरीश को गरिमा के साथ मरने का अधिकार मिला.
कोर्ट ने फैसले की शुरुआत जीवन और मृत्यु पर विचार से की
फैसले में बेंच ने जीवन और मृत्यु की जटिलता पर विचार किया. अमेरिकी प्रचारक हेनरी वार्ड बीचर के शब्द उदाहरण के तौर पर रखे गए कि भगवान किसी से जीवन स्वीकार करने के लिए नहीं पूछते. यह चुनाव नहीं है. आपको इसे लेना ही पड़ता है. एकमात्र सवाल है, कैसे. जजों ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध सवाल to be or not to be का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट को भी कठिन सवालों का सामना करना पड़ता है. जस्टिस पारदीवाला ने अपना मत पहले पढ़ा और कई मार्मिक टिप्पणियां कीं.
उन्होंने कहा कि इस मामले के मुद्दों ने हमारे सामने जीवन की नाजुकता और क्षणभंगुरता को सामने ला दिया है. उन्होंने कहा कि हरीश राणा अपनी पीड़ा व्यक्त करने की आवाज से वंचित हो गए हैं. उन्होंने कहा कि आज हमारा फैसला सिर्फ तर्क पर नहीं, बल्कि प्यार, चिकित्सा और विज्ञान के स्थान पर टिका है. फिर वे हरीश के माता-पिता को संबोधित करते हुए कहा कि यह गहरी करुणा और साहस का कार्य है. आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे. आप उन्हें गरिमा के साथ जाने दे रहे हैं. इतना कहते-कहते जस्टिस पारदीवाला भावुक हो गए और रो पड़े.
''मरीज के सर्वोत्तम हित''
जस्टिस केवी विश्वनाथन ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत हमेशा मरीज की भलाई होना चाहिए. उन्होंने कहा कि मरीज का सर्वोत्तम हित ही एकमात्र विचारणीय हित है. जब मरीज खुद सूचित निर्णय नहीं ले सकता, तो यह सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है.
Common Cause मामले के फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि उपचार हटाने का कोई भी निर्णय दो आधारों पर टिकना चाहिए. हस्तक्षेप मेडिकल ट्रीटमेंट होना चाहिए, और दूसरा, यह मरीज के सर्वोत्तम हित में होना चाहिए. कोर्ट ने जोड़ा कि मरीज के सर्वोत्तम हित का निर्धारण मेडिकल सबूतों और परिस्थितियों की तथ्य-आधारित और समग्र जांच से होता है.