UP के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के लिए इतने जरूरी क्यों हैं?

Global Bharat 17 Jul 2024 08:17: PM 3 Mins
UP के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के लिए इतने जरूरी क्यों हैं?

उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के लिए इतने जरूरी क्यों हैं? क्यों पार्टी इन्हें फ्रंट में नहीं आने दे रही लेकिन पूरी तरह साइड भी नहीं होने दे रही? दरअसल ये सवाल तब उठने लगे जब यूपी की सियासत में हलचल तेज़ हो गई. पहले केशव प्रसाद मौर्य पार्टी बैठकों से नदारद रहे फिर जब एक बैठक में शामिल हुए तो ऐसे बयान दे दिए जिसने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया. ऐसे में सवाल है कि केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी की जरूरत क्यों है इस सवाल का जवाब जानने के लिए केशव प्रसाद मौर्या के बारे में जानना जरूरी है. 

दरअसल, केशव प्रसाद मौर्य आरएसएस-बीजेपी का मौर्य चेहरा हैं और वो हिन्दुत्व की राजनीति में बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसमें ग़ैर-यादव ओबीसी समुदाय को साधने की कोशिश होती है. केशव प्रसाद मौर्य जिस जाति से आते हैं वो पूरे उत्तर प्रदेश में है. इस जाति की पहचान अलग-अलग नामों से है. जैसे- मोराओ, मौर्य, शाक्य, कुशवाहा, काछी कोइरी,और सैनी. यूपी की कुल आबादी में ये जातियां 8.5 फ़ीसदी हैं. इस जाति के लोग ज्यादातर खेती-किसानी करते हैं.

इसीलिए जब 2017 और 2022 में इन्हे डिप्टी सीएम बनाया गया तब राजनीति के जानकारों ने कहा कि जातीय समीकरण को साधने के लिए ही केशव प्रसाद मौर्य को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया है. क्योकि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी बिना कोई सीएम चेहरा के मैदान में उतरी थी. केशव प्रसाद मौर्य के समर्थकों का मानना था कि पार्टी जीती तो मौर्य मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे. लेकिन जब पार्टी पूर्ण बहुमत से जीती तो केंद्रीय नेतृत्व ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया.

जिससे केशव प्रसाद मौर्य आहत हुए और कहा तो ये भी जाता है कि यही वजह है कि योगी और मौर्य के रिश्ते भी ठीक नहीं हैं. हालांकि बार बार ऐसी अटकलें लगी तो इसपर विराम लगाने के लिए मौर्य ने एक इंटरव्यू में कहा था कि दुनिया की कोई भी ताक़त उनके मज़बूत संबंधों को तोड़ नहीं सकती है. हालांकि इस बयान का भी अटकलों पर कोई असर नहीं पड़ा और विपक्ष केशव के ज़ख्मों पर नमक छिड़कता रहा. अखिलेश यादव ने तो कहना शुरू कर दिया कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसी ओबीसी को शीर्ष की सीट नहीं देना चाहती है.

यहां तक कि अखिलेश ने केशव प्रसाद मौर्य को 'स्टूल वाले उप-मुख्यमंत्री' तक कह दिया था. अब राजनीति में अटकलें लगना आम बात है चलिए अब हम बात करते हैं केशव प्रसाद मौर्य के राजनीतिक करियर के बारे में. तो आपको बता दें कि लंबे समय से विश्व हिंदू परिषद से जुड़े केशव प्रसाद मौर्य ने 2002 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और बीजेपी के टिकट पर पहली बार इलाहाबाद शहर पश्चिमी विधानसभा सीट से चुनाव लड़े लेकिन हार गए.

2002 में हार के बाद केशव प्रसाद मौर्य ने 2007 में एक बार फिर उन्‍होंने इलाहाबाद शहर पश्‍चिमी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी उन्‍हें जीत नसीब नहीं हुई. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्‍होंने सिराथू विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर किस्‍मत आजमाई और जीत दर्ज की. दो साल विधायक रहे फिर 2014 लोकसभा में फूलपुर सीट से चुनाव लाडे और जीते भी. सांसद बनते ही केशव प्रसाद मौर्य का कद बीजेपी में काफी बढ़ गया. क्योंकि इन्हें फूलपुर में 52 फ़ीसदी मत मिले थे.

फूलपुर को नेहरू-गांधी परिवार का मजबूत गढ़ कहा जाता था. यहां से नेहरू सांसद बने थे. इसके बाद 2016 में उन्‍हें भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. ऐसा करने की वजह बीजेपी का एजेंडा था. जिसके तहत वो ग़ैर-यादव ओबीसी वोटरों को लुभाना  चाहती थी. भले ही बीजेपी में उनका राजनीतिक सफर ज्‍यादा लंबा नहीं है, लेकिन राजनीतिक करियर शुरू करने से पहले वो विश्‍व हिंदू परिषद और बजरंग दल में करीब 18 साल तक प्रचारक रहे हैं.आरएसएस में इन्होने बाल स्वयंसेवक से शुरुआत की और नगर कार्यवाह बने. साथ ही वीएचपी में संगठन मंत्री भी रहे.

मौर्य गोरक्षा अभियान में  सक्रिय रहे और राम जन्मभूमि आंदोलन में भी शामिल थे. पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ, किसान मोर्चा के अध्यक्ष और क्षेत्रीय सम्न्वयक रहे. केशव प्रसाद मौर्य का जन्म 7 मई 1969 में कौशांबी जिले के सिराथू में हुआ था. केशव प्रसाद मौर्य ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद से हिन्दी साहित्य की पढ़ाई की है.

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