सऊदी अऱब में तीन दिनों में 900 लोगों की मौत ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. इंडोनेशिया, जॉर्डन, ईरान, सेनेगल हर जगह की सरकारें ताबूत का इंतजाम करवा रही है, ताकि वहां से अपने लोगों को वापस लाया जा सके. इन लोगों में भारत के भी 68 मुस्लिम शामिल हैं, जिन्हें भारत सरकार सऊदी सरकार के सहयोग से वापस लाएगी. लेकिन सवाल ये है कि आखिर हज के लिए गए इतने लोगों की मौत कैसे हो गई.
पहली वजह गर्मी बताई जा रही है, लेकिन सिर्फ यही एक वजह नहीं है, बल्कि 900 लोगों की मौत पर अब एक बड़ा खुलासा हुआ है. सऊदी की स्टेट टीवी के मुताबिक मक्का की ग्रैंड मस्जिद का तापमान 51.8 डिग्री सेल्यिसस था. गर्मी बढ़ने की वजह सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि एक शांत ज्वालामुखी थी, यानी साइलेंट दुश्मन बैठा है. मदीना के पास ही शांत ज्वालामुखी हररत है, जिसकी वजह से तापमान लगातार बढ़ता रहता है. सऊदी सरकार की ओर से माकूल इंतजाम नहीं किया जाना भी श्रद्धालुओं की जान जाने की वजह है.
यूएस गवर्नमेंट की रिसर्च ये बताती है ज्वालामुखी 'हररत रहत' जो धरती के काफी नीचे है. यह एक एक शांत ज्वालामुखी है. इसका तापमान 1200 डिग्री सेल्सियस तक होता है, इसकी वजह से ही मक्का के आसपास का तापमान बढ़ रहा है. इस्लाम के जानकार कहते हैं कि बकरीद से एक महीने पहले हज यात्रा शुरू होती है. हर साल बकरीद की तारीख करीब 10 दिन पीछे हो रही है.
मतलब साल 2024 में बकरीद 16 जून को थी तो 2025 में बकरीद 6 जून के आसपास हो सकती है. इस हिसाब से जब ठंड के दिनों में हज यात्रा होगी तो इस तरह की दिक्कतें नहीं आएंगी. लेकिन यहां एक चौंकाने वाली बात ये भी है कि सऊदी का तापमान हर साल 0.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है, इस हिसाब से आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इसलिए सऊदी सरकार को हर हज यात्री के लिए खास इंतजाम करवाना होगा.
हैरानी इस बात की है कि सऊदी सरकार हर हज यात्री से टैक्स भी लेती है. एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक सउदी अरब सरकार ने हज पर टैक्स बढ़ा कर 15 फीसदी कर दिया है. हज वीजा शुल्क और स्वास्थ्य बीमा शुल्क में भी बढ़ोतरी कर दी गई है. इसके साथ ही कुर्बानी के लिए अलग से 16,747 रुपये का खर्च उठाना होगा. हालांकि यह बढ़ोतरी कोरोना के समय किया गया था.
यही वजह है कि कई लोग इसकी तुलना मुगलों के दौर में लिए जाने वाले महसूल से करने लगे हैं, जो हिंदुओं से तीर्थयात्रा करने पर लिया जाता था. हम इन तुलनाओं में नहीं पड़ना चाहते, बल्कि यही कहना चाहेंगे कि ऐसी घटनाओं पर भारत सरकार को सऊदी सरकार से बात करनी चाहिए, ताकि हिंदुस्तान से जाने वाले जायरीनों यानी हज यात्रियों को कोई तकलीफ न हो.
हज यात्री बताते हैं कि सऊदी अरब पहुंचने के बाद हज यात्रा की शुरुआत अहराम से हो जाती है. हज यात्रियों को जो आप खास तरह का सफेद रंग का कपड़ा पहने देखते हैं, वही अहराम है. उसके बाद उमराह किया जाता है, ये एक धार्मिक प्रक्रिया होती है, उसके बाद मीना शहर और अराफात के मैदान में जाकर दुआं करते हैं, नमाज अदा करते हैं.
यहां से मक्का तक का सफर 8 किलोमीटर का है, जो पैदल पूरा करना होता है. ऊपर से पड़ रही भीषण गर्मी और नीचे की गर्म सड़क पर चलना हर किसी के वश की बात नहीं होती है. मक्का पहुंचते ही जमारात शुरू होता है. आसान भाषा में जमारात का मतलब है कि हर हज यात्री वहां बनी शैतान की मूर्ति को पत्थर मारता है. उसके बाद हज यात्री बकरे या भेड़ की कुर्बानी देते हैं.
मर्द अपना सिर मुंडवाते हैं, महिलाएं अपना हल्का बाल काटती हैं. फिर मक्का की मुख्य मस्जिद में सभी हज यात्री पहुंचते हैं, जिसे काबा कहते हैं. हर हज यात्री काबा के 7 चक्कर लगाते हैं, जिसे तवाफ कहते हैं. इसी दिन दुनियाभर के मुसलमान ईद उल अजहा या बकरीद का त्यौहार मनाते हैं. इसके बाद लोग मक्का से मीना लौटते हैं, वहां दो दिन रुकते हैं. मुस्लिम महीने के 12 तारीख को आखिरी दुआं करते हैं और इस तरह से हज यात्रा पूरी हो जाती है.