इलाहाबाद HC ने कस्टडी विवाद पर दिया महत्वपूर्ण फैसला, मां की याचिका की खारिज

Amanat Ansari 19 Apr 2026 02:25: PM 2 Mins
इलाहाबाद HC ने कस्टडी विवाद पर दिया महत्वपूर्ण फैसला, मां की याचिका की खारिज

Allahabad High Court: पिता अगर मां से बच्चा जबरन ले जाए तो उसे बंधक बनाना नहीं माना जा सकता. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने अपने दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी मांगी थी.

अदालत का कहना है कि पिता स्वाभाविक रूप से बच्चों का प्राकृतिक अभिभावक होता है. जब तक कोई अदालत का आदेश तोड़ा नहीं गया हो, तब तक पिता के पास बच्चों को रखना अवैध नहीं माना जाएगा. महिला का आरोप था कि उसके पूर्व पति ने साल 2022 में बंदूक दिखाकर दोनों बच्चों को उसके पास से ले लिया और तब से उन्हें अपने साथ रखे हुए है.

लेकिन कोर्ट ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के झगड़े में अगर कोई अदालती आदेश का उल्लंघन नहीं हुआ है, तो पिता बच्चों को अपने साथ रख सकता है. भले ही बच्चों को मां से अलग करने के लिए किसी भी तरह की जबरदस्ती का इस्तेमाल किया गया हो. अदालत का मत है कि पिता को बच्चों पर प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होता है.

न्यायमूर्ति अनिल कुमार की एकलपीठ ने कहा कि बच्चों की कस्टडी संबंधी याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब यह साबित हो कि बच्चे अवैध या गैरकानूनी तरीके से किसी की हिरासत में हैं. कोर्ट ने हिंदू अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम की धारा 4(2) का हवाला देते हुए कहा कि पिता को बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है.

साथ ही आईपीसी की धारा 361 की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा कि नाबालिग को उसके माता-पिता में से किसी एक से अलग करना अपराध तभी माना जाएगा, जब वह प्राकृतिक अभिभावक से अलग किया गया हो. अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों बच्चे 5 साल से ज्यादा उम्र के हैं और पिछले चार साल से पिता के साथ रह रहे हैं. मामले में कोई ऐसी खास परिस्थिति नहीं बताई गई जिससे लगे कि बच्चों की स्थिति खतरनाक है या उनकी कस्टडी पूरी तरह गैरकानूनी है.

इस आधार पर कोर्ट ने मां की याचिका खारिज कर दी और कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है. संक्षेप में, कोर्ट का यह फैसला बताता है कि पिता के पास बच्चों को रखना तब तक कानूनी माना जाएगा, जब तक कोई अदालती आदेश का सीधा उल्लंघन न हुआ हो, भले ही शुरू में बच्चों को मां से अलग करने के लिए जबरदस्ती का इस्तेमाल हुआ हो.

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