नई दिल्ली: 1970 के दशक की शुरुआत में एक अमेरिकी डॉक्टर भारत आए. उनका नाम था डॉ. लैरी ब्रिलियंट. वे आध्यात्मिक खोज में कैची धाम (उत्तराखंड) स्थित नीम करोली बाबा के आश्रम पहुंचे. वहां बाबा ने उन्हें “डॉक्टर अमेरिका” कहना शुरू कर दिया. उसी मुलाकात ने उनकी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी.
ट्राइसाइकिल: द बुद्धिस्ट रिव्यू को दिए एक इंटरव्यू में डॉ. ब्रिलियंट ने याद किया कि जुलाई 1973 में एक दिन नीम करोली बाबा ने उनसे कहा, “तुरंत दिल्ली जाओ और संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करो. चेचक (स्मॉलपॉक्स) को मिटाने में मदद करो.” बाबा ने उनसे पूछा, “डॉक्टर अमेरिका, तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?” ब्रिलियंट ने कहा 500 डॉलर. बाबा ने हंसते हुए जवाब दिया कि अमेरिका में भी उतने ही हैं. फिर बाबा ने मजाक में कहा, “यहां 500, वहां 500... तुम डॉक्टर नहीं हो.” और फिर गंभीर हो गए, “यूनाइटेड नेशंस ऑर्गनाइजेशन... डॉक्टर अमेरिका यूएन डॉक्टर बनेंगे और चेचक मिटाने में मदद करेंगे. यह भयानक बीमारी मानवता के कंधे से भगवान के वरदान से हटेगी.”
चेचक उन्मूलन अभियान में शामिल हुए
बाबा के निर्देश के बाद डॉ. ब्रिलियंट विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के चेचक उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़ गए. भारत में उन्होंने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1980 में WHO ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि दुनिया से चेचक पूरी तरह खत्म हो चुका है. यह पहली ऐसी मानव बीमारी थी जिसे पूरी तरह मिटाया गया.
डॉ. ब्रिलियंट आज भी कैची धाम और नीम करोली बाबा की उस मुलाकात को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ मानते हैं. बाबा के शब्दों ने उन्हें चिकित्सा ज्ञान को मानवता की सेवा में लगाने का नया रास्ता दिखाया. यह कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि आस्था, संयोग और सेवा के अद्भुत मेल की है, जिसने दुनिया को एक खतरनाक बीमारी से मुक्त करने में मदद की.