पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस अचानक कोलकाता छोड़कर दिल्ली क्यों पहुंच गए, क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें तलब किया या फिर खुद ही कोई ऐसी रिपोर्ट लेकर जिससे ममता सरकार की धड़कनें बढ़ने वाली है. एक मीडिया चैनल से बातचीत में सीवी बोस ये दावा करते हैं कि ''मैंने घटना के बाद मुख्यंत्री ममता बनर्जी से बात की, सरकार से हमने तीन रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें से सिर्फ एक ही रिपोर्ट हमें मिल पाई है, बाकी की दो रिपोर्ट घटना के इतने दिन बाद भी नहीं मिल पाई. पूरा समाज डरा हुआ है, पश्चिम बंगाल महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है. सरकार इसे ठीक से संभाल नहीं पाई है.''
राज्यपाल महोदय का ये गुस्सा बता रहा है कि वो बंगाल पुलिस की जांच से संतुष्ट नहीं हैं, अगर उन्होंने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी तो फिर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लग सकता है, लेकिन सवाल ये है कि क्या सीवी आनंद बोस ऐसा करेंगे. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के दो ही मायने निकल सकते हैं.
पहला- इतनी बड़ी घटना के बाद राष्ट्रपति ने हालात का जायजा लेने के लिए इन्हें खुद बुलाया हो
दूसरा- कोई ऐसी कॉन्फिडेंशियल फाइल हो जिसपर राज्यपाल महोदय राष्ट्रपति से मिलकर चर्चा करना चाहते हों
बंगाल में बीते कुछ दिनों में जितनी घटनाएं हुई हैं, चाहे वो संदेशखाली का केस हो या फिर आरजीकर मेडिकल कॉलेज का मामला, हर मामले को लेकर महिलाओं का वर्ग काफी गुस्से में है, पर हैरत की बात ये है कि ममता बनर्जी एक महिला होने के बावजूद भी महिलाओं का दर्द नहीं समझ रही हैं, हो सकता है राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बंगाल की महिलाओं का दर्द समझें.
अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति के पास ये अधिकार होता है कि अगर राज्य सरकार ठीक से शासन नहीं चला पा रही है तो उस राज्य को सीधा राष्ट्रपति अपने कंट्रोल में ले ले. ममता बनर्जी के साथ परेशानी वाली बात ये है कि राज्यपाल सीवी आनंद बोस से उनका छत्तीस का आंकड़ा शुरू से ही रहा है. जो हाल दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का कभी उपराज्यपाल के साथ था, वही हाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का मौजूदा राज्यपाल से है. अब चूंकि माननीय राज्यपाल सीवी बोस एक IAS ऑफिसर भी रहे हैं, इसलिए सरकार की हर गलती चुटकियों में पकड़ लेते हैं.
कौन हैं सीवी आनंद बोस
जैसे ही इनकी नियुक्ति की ख़बर बंगाल सरकार तक पहुंची थी टीएमसी नेताओं ने विरोध करना शुरू कर दिया था और केन्द्र सरकार पर एकतरफा नियुक्ति के आरोप लगाए थे. पर सवाल ये है कि ममता बनर्जी क्या लोकतंत्र को राजतंत्र की तरह चलाना चाहती हैं, जिसमें जो मन आए करो, कोई सवाल उठाने वाला न हो. जिस कोलकाता केस पर पूरा देश गुस्से में है, बड़े-बड़े स्टार ये कह रहे हैं कि 12 साल बाद भी देश में कुछ नहीं बदला, कानून कड़े किए जाने के बाद भी बदलाव नहीं आए, तब ममता बनर्जी अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरकर क्या साबित करना चाहती है, क्या वो ये कहना चाहती हैं कि सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा, इसलिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है, अगर ऐसा है तो फिर ममता बनर्जी को नैतिक रूप से इस्तीफा दे देना चाहिए, ऐसी मांग कई नेता अब तक कर चुके हैं. यहां सवाल सियासत का नहीं बल्कि महिला सुरक्षा का है, और इस मुद्दे पर कम से कम हर पार्टी के नेता को एकमत होकर फैसला लेना चाहिए, क्योंकि आरोपी का कोई जाति, धर्म या पार्टी नहीं होता. पर ये बात हमारे नेता कब समझेंगे.