अब तक आपने नेताओं को ये कहते सुना होगा पाकिस्तान चले जाओ, गिरिराज सिंह का तो इस बयान पर एक तरह से कॉपीराइट है. लेकिन देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी अदालत को ये कहना पड़ा हो कि पाकिस्तान चले जाओ. पूरी कहानी शरणार्थी हसन से जुड़ी है, जो 10 साल पहले यानि साल 2014 में स्टूडेंट वीजा पर भारत आया था, यानि यहां आकर से पढ़ाई करनी थी, नौकरी मिल जाती तो करता, वरना वापस लौट जाता. पर उसने एक साल की भीतर ही नया खेल कर दिया. साल 2015 में अपनी पत्नी को मेडिकल वीजा पर हिंदुस्तान बुला लिया.
इस तरह के वीजा की टाइमिंग, दो साल, तीन साल, या चार साल होती है. इस हिसाब से एक वीजा 2015 में खत्म हुआ तो दूसरे का 2017 में. लेकिन बावजूद इसके दोनों ने भारत नहीं छोड़ा. जब पुणे पुलिस ने इन्हें कहा कि आपको डिपोर्ट कर दिया जाएगा तो इन्होंने सहानूभूति कार्ड खेलना शुरू कर दिया. हसन और उसकी पत्नी ने कहा कि हमारे देश यमन में हालात ठीक नहीं हैं. वहां एक दशक से गृहयुद्ध के हालात हैं, लाखों लोग बेघर हो चुके हैं, ऐसे में हमारे लिए वहां लौटना ठीक नहीं है. जब तक ऑस्ट्रेलिया का वीजा हमें नहीं मिल जाता, प्लीज यहां रहने दीजिए.
हसन की ये बात सुनने में भावुक करने वाली लगती है, लेकिन देश भावुकता से नहीं चलता और ना ही अदालत भावुक बातें सुनकर पैसला सुनाती है. इसलिए जैसे ही मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में पहुंचा कहानी पलट गई. जस्टिस रेवती मोहित डेरे और जस्टिस पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद कहा कि आप भारत के उदारवादी रवैये का अनुचित फायदा न उठाएं. आप पाकिस्तान या फिर किसी और खाड़ी मुल्क में जा सकते हैं, वहां जाकर शरण ले सकते हैं. सुनवाई के दौरान पुणे पुलिस की ओर से पेश वकील ने ये भी तर्क दिया कि शरणार्थी कार्ड स्वीकार करने वाले दुनिया के 129 देशों में से किसी में भी ये लोग जाकर रह सकते हैं, वहां रहने की अपील कर सकते हैं.
भारत में पहले से ही शरणार्थियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि पूरा सिस्टम परेशान है. आप ये जानकर शायद हैरत में पड़ जाएंगे कि हिंदुस्तान की ज्यादातर आबादी को उसका हक इसलिए ठीक से नहीं मिल पा रहा है क्योंकि हमारा ध्यान शरणार्थियों पर ज्यादा है. संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था यानि UNHCR के आंकड़े बताते हैं कि 31 जनवरी 2022 तक, 46,000 से अधिक शरणार्थी और शरण चाहने वाले UNHCR भारत के साथ पंजीकृत हैं. इसमें मुख्यतः म्यांमार और अफगानिस्तान से हैं. जिनमें 46% शरणार्थी महिलाएं और लड़कियां हैं और 36% बच्चे हैं.
लेकिन ये संख्या इससे कई गुणा ज्यादा भी हो सकती है, क्योंकि जिस हिसाब से अलग-अलग जगहों से बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं के डॉक्यूमेंट बरामद हो रहे हैं, जिस हिसाब से उनकी गिरफ्तारियां हो रही है और उनसे जुड़े राज खुल रहे हैं वो साफ इस ओऱ इशारा करता है कि भारत में शरणार्थियों की संख्या का सही रिकॉर्ड शायद सरकार के पास भी नहीं है, क्योंकि कौन आपके यहां आकर फर्जी डॉक्यूमेंट बनवाकर रहने लग रहा है, आपको कैसे पता चलेगा.
हमारे ही देश के कुछ लोग चंद पैसों की खातिर दूसरे देश के लोगों को अपने यहां बसा रहे हैं, जबकि उन्हें ये सोचना चाहिए कि शरणार्थियों को शरणार्थी की तरह ही रखना होगा. इन्हें नागरिक बनाकर नहीं रखा जा सकता. हसन जैसे लोग अगर कहते हैं, मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं, तो समझिए कि उन्हें यहां कितना सुकून मिल रहा है. इंसानियत के नाते मदद सबकी होनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र का नियम भी यही कहता है कि मदद मिलनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब ये नहीं होना चाहिए कि मदद के नाम पर अपने ही लोग परेशान होते रहे.