Nepal-like incident in Bengal and Darjeeling: नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ ने पूरे पूर्वी हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भूकंप, हिमस्खलन, मूसलाधार बारिश या ग्लेशियर झील फटने जैसी घटनाएं एक के बाद एक जुड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक तबाही मचा सकती हैं.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अनुसार, पूर्वी हिमालयी क्षेत्र 2050 तक पीक GLOF (ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड) जोखिम सीमा पर पहुंच सकता है. इस सदी के अंत तक पूरे हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में GLOF का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है.
दार्जिलिंग और बंगाल के लिए क्यों खतरा?
दार्जिलिंग जिले में सिक्किम जैसी विशाल ग्लेशियर झीलें नहीं हैं, फिर भी यह क्षेत्र उसी नाजुक और भूगर्भीय रूप से अस्थिर हिमालयी तंत्र का हिस्सा है. यह हाई रिस्क ‘जोन IV’ में आता है. तेज भूकंप पहाड़ी ढलानों को ढीला कर नदियों के रास्ते ब्लॉक कर सकते हैं. मूसलाधार बारिश और कमजोर पहाड़ियों के कारण भूस्खलन आम हैं. अक्टूबर 2025 में 12 घंटे में 300 मिमी से ज्यादा बारिश से व्यापक भूस्खलन हुआ था, जिसमें 24 लोगों की जान चली गई थी.
ऊपरी हिमालय में GLOF का सीधा असर पश्चिम बंगाल के उत्तरी जिलों तक पहुंचता है. अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील फटने से तीस्ता नदी में आई बाढ़ ने कलिम्पोंग और बंगाल के मैदानी इलाकों में भारी तबाही मचाई थी. मॉडल के अनुसार, संभावित GLOF से बंगाल-सिक्किम सीमा पर 10,000 से ज्यादा लोग, 1,900 इमारतें, 5 पुल और 2 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं.
कैसे काम करती है कैस्केडिंग आपदा?
पहाड़ी ढलानों से बर्फ या चट्टानों का मलबा खिसकता है, नदी का रास्ता बंद होकर अस्थायी झील बनती है, पानी का दबाव बढ़ने पर बांध टूटता है, नीचे की ओर उफनती फ्लैश फ्लड आती है. हिमस्खलन ग्लेशियर झील में गिरकर बड़ी लहरें पैदा कर झील की दीवारें भी तोड़ सकता है.
क्या करना होगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि अब अलग-अलग आपदाओं के बजाय पूरे नदी-बेसिन को एक इकाई मानकर योजनाएं बनानी होंगी. ग्लेशियर झीलों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, ढलानों पर अनियंत्रित निर्माण पर रोक, भूकंप-रोधी संरचनाएं और हिमालय की चोटियों से लेकर बंगाल के निचले इलाकों तक मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी है.