पटना : बिहार की राजनीति में इस बार मुकाबला बेहद ही दिलचस्प होने जा रहा है. आगामी अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को बिहार का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है. भाजपा नेतृत्व ने जिस रणनीतिकार को चुना है, उनकी पहचान चुनाव जिताने वाले नेता के रूप में है. हरियाणा और ओडिशा जैसे राज्यों में उन्होंने बीजेपी को चमत्कारिक जीत दिलाई. वहीं, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी उनकी भूमिका रणनीति निर्णायक साबित हुई. सवाल यह है कि क्या वे बिहार जैसे जटिल सामाजिक समीकरणों वाले राज्य में भाजपा के लिए वही करिश्मा दोहरा पाएंगे.
धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय से बीजेपी के संगठन में सक्रिय भूमिका में हैं और चुनावी राजनीति में उनकी पहचान एक “ट्रबलशूटर” और “संकट मोचक” के रूप में है. बिहार में नीतीश कुमार से उनके पारिवारिक व व्यक्तिगत संबंध भी हैं, क्योंकि उनके पिता देबेंद्र प्रधान का जेडीयू नेता से पुराना जुड़ाव रहा है. यही वजह है कि जब भी भाजपा-जेडीयू गठबंधन में कोई खींचा-तानी होती है तो प्रधान अक्सर सुलह कराने वाले संकटमोचक के रूप में सामने आए. उनकी कार्यशैली का सबसे बड़ा पहलू यह है कि वे स्थानीय समीकरणों को बखूबी समझते हैं और फिर राष्ट्रीय एजेंडे को उस पर फिट कर देते हैं.
यूपी में बीजेपी को दिलाई जीत
उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी 403 सीटों में से 255 सीटें जीतकर फिर से सरकार बनाई. जातीय संतुलन साधने, बूथ प्रबंधन मजबूत करने और मोदी-योगी की लोकप्रियता को ग्राउंड मैकेनिज्म से जोड़ने में काफी मददगार रही. ओडिशा में 2024 प्रधान का गृहराज्य होने के बावजूद भाजपा के लिए यह कभी आसान राज्य नहीं रहा, लेकिन पहली बार पार्टी ने यहां पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. लोकसभा की 20 सीटें और विधानसभा की 78 सीटों पर जीत को श्रेय प्रधान की रणनीति को माना गया.
हार की भविष्यवाणी हुई सच
हरियाणा में 2024 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान एक्जिट पोल्स भाजपा की हार की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन प्रधान की शांत रणनीति ने एकदम से पलट दिया. वहीं, कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की क्षमता ने तस्वीर पलट दी. भाजपा ने 48 सीट जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई. जाट-गैर जाट समीकरण को तोड़ने की कला को उनका मास्टरस्ट्रोक माना गया.
बिहार में उनके सामने है चुनौतियाँ
बिहार का राजनीतिक बेहद ही पेंचीदा है. एनडीए में भाजपा और जेडीयू साझीदार हैं, लेकिन नीतीश कुमार की बार-बार बदलती राजनीतिक स्थिति गठबंधन के लिए अस्थिरता का कारण बन सकती है. दूसरी ओर महागठबंधन आरजेडी, कांग्रेस व वाम दल पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर रहा है. कांग्रेस पार्टी ने 1944 के बाद पहली बार पटना में कार्य समिति की बैठक कर माहौल बनाने की कोशिश की है. पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने यहां तक दावा कर दिया कि बिहार से ही मोदी सरकार की विदाई की शुरुआत होगी.
क्या होगा असर
बिहार की राजनीति में जातीय आधार और गठबंधन समीकरण हर विधानसभा चुनाव निर्णायक भूमिका निभाते हैं. धर्मेंद्र प्रधान ने यूपी और हरियाणा जैसे राज्यों में यही संतुलन साधकर जीत दिलाई. बिहार में उन्हें यादव, कुर्मी, भूमिहार, दलित और अल्पसंख्यक वोटों की जटिल संरचना को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी. अगर वे एनडीए गठबंधन को एकजुट रखने, जेडीयू के साथ विश्वास बनाए रखने और विपक्षी नैरेटिव को रोजगार-विकास एजेंडे से काटने में सफल रहे, तो हरियाणा जैसी ‘उलटफेर’ बिहार में भी संभव है.