नई दिल्ली: पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार को 79 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. उनका निधन आज दोपहर लगभग 1 बजे नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुआ, जहां उनका इलाज चल रहा था. मलिक ने अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतिम राज्यपाल के रूप में कार्य किया.
उनके कार्यकाल के दौरान ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया और राज्य का विशेष दर्जा समाप्त किया गया. आज इस फैसले की छठी वर्षगांठ है. इसके बाद उन्हें गोवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया और फिर उन्होंने अक्टूबर 2022 तक मेघालय के राज्यपाल के रूप में सेवा दी. अपने लंबे राजनीतिक करियर और विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाने वाले मलिक का जीवन उतार-चढ़ाव और राजनीतिक दलों के बीच बदलाव से भरा रहा.
जनता पार्टी से बीजेपी तक का सफर
सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में हुआ था. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1970 के दशक में जनता पार्टी से की और 1974 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए. 1980 के दशक में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और 1984 में अलीगढ़ से लोकसभा सांसद बने. इसके बाद, 1989 में वे समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े और उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे.
2004 में मलिक ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में प्रवेश किया और 2012 में बागपत से लोकसभा सांसद चुने गए. उनकी वाकपटुता और जाट समुदाय के बीच मजबूत पकड़ ने उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक प्रमुख नेता बनाया. 2017 में उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जिसके बाद वे जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय के राज्यपाल रहे.
जम्मू-कश्मीर में ऐतिहासिक कार्यकाल
मलिक ने अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के अंतिम राज्यपाल के रूप में कार्य किया. उनके कार्यकाल के दौरान 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया, जिसने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित किया गया. यह निर्णय बीजेपी की विचारधारा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, और मलिक ने इस दौरान केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम किया.
मोदी सरकार के खिलाफ बगावत
हालांकि, मलिक बाद में मोदी सरकार के खिलाफ मुखर हो गए. 2021 में, उन्होंने जम्मू-कश्मीर में कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक खामियों को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि उन्हें एक बीमा सौदे में रिश्वत की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया. इसके अलावा, उन्होंने 2019 के पुलवामा हमले के बाद सुरक्षा चूक पर भी सवाल उठाए और केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की.
मलिक ने 2020-21 के किसान आंदोलन का भी समर्थन किया और केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की. उनकी यह बगावत उन्हें बीजेपी के लिए असहज करने वाली थी, और उनकी टिप्पणियों ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका दिया.
अंतिम वर्ष और निधन
2022 में मेघालय के राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद, मलिक ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी. उनकी तबीयत पिछले कुछ समय से खराब थी, और वे लंबे समय तक बीमार रहे. मंगलवार, 5 अगस्त 2025 को, अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण की छठी वर्षगांठ के दिन, उनका निधन हो गया. सत्यपाल मलिक एक ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने विभिन्न दलों और विचारधाराओं के साथ काम किया.
उनकी बेबाकी और साहसिक बयानों ने उन्हें सुर्खियों में रखा, लेकिन उनकी आलोचनाओं ने उन्हें विवादों में भी घेरा. जम्मू-कश्मीर में उनके कार्यकाल को ऐतिहासिक माना जाता है, लेकिन उनकी बाद की टिप्पणियों ने उन्हें केंद्र सरकार के खिलाफ एक आलोचक के रूप में स्थापित किया. उनके निधन पर कई नेताओं ने शोक व्यक्त किया है, और उनके योगदान को उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हमेशा याद किया जाएगा.