नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए.एस. ओका ने न्यायपालिका की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि आम लोगों की जो उम्मीदें न्याय व्यवस्था से जुड़ी थीं, वे पूरी नहीं हो पाई हैं. एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस ओका ने माना कि संविधान में न्यायपालिका को लेकर जो भरोसा और अपेक्षाएं थीं, उन पर खरा उतरने में हमारी अदालतें काफी हद तक असफल रहीं.
उन्होंने जोर देकर कहा कि व्यवस्था के अंदर काम करने वाले लोग (वकील और जज) अक्सर अपनी तारीफ करते समय यह भूल जाते हैं कि आम आदमी को अदालतों में क्या-क्या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. उन्होंने आगे कहा कि अगर किसी को यह कहना है कि आम भारतीयों का न्यायपालिका में गहरा विश्वास है, तो यह बात उन लोगों को कहनी चाहिए जो इस व्यवस्था के बाहर हैं, न कि खुद जजों या वकीलों द्वारा.
जस्टिस ए.एस. ओका ने स्वीकार किया कि भारतीय नागरिकों ने कानूनी व्यवस्था से बहुत बड़ी उम्मीदें रखी थीं, लेकिन कुछ कारणों से न्यायपालिका उन उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकी. यह टिप्पणी उन्होंने सोमवार को दिल्ली में आयोजित 45वें जे.पी. मेमोरियल लेक्चर के दौरान की. इस कार्यक्रम का आयोजन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) ने किया था. उनके भाषण का बड़ा हिस्सा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मुद्दों पर केंद्रित रहा.
जस्टिस ओका ने यह भी बताया कि भारतीय संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का वादा करता है, लेकिन ये वादे तब तक साकार नहीं हो सकते, जब तक अदालतें गुणवत्तापूर्ण और तेज़ न्याय उपलब्ध नहीं करातीं. उन्होंने न्यायपालिका की मौजूदा चुनौतियों की भी चर्चा की. इनमें जजों की कमी और खराब न्यायिक बुनियादी ढांचा प्रमुख हैं.
उन्होंने 2002 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का जिक्र किया, जिसमें पांच साल के अंदर प्रति दस लाख आबादी पर 50 जजों की नियुक्ति का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन आज भी हम सिर्फ 22-23 जजों प्रति दस लाख आबादी के आसपास संघर्ष कर रहे हैं. वहीं कई विकसित देशों में यह अनुपात 80 से 90 या उससे भी ज्यादा है.