एक देश, एक चुनाव में कितना आएगा खर्च, क्या आपका वोटर आईडी कार्ड भी बदलेगा! समझिए हर सवाल का जवाब

Global Bharat 18 Sep 2024 09:51: PM 4 Mins
एक देश, एक चुनाव में कितना आएगा खर्च, क्या आपका वोटर आईडी कार्ड भी बदलेगा! समझिए हर सवाल का जवाब

अभी चुनाव को 4 महीने बीते हैं, फिर नए चुनाव की चर्चा क्यों होने लगी है. साल 2029 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बनेंगे, योगी आदित्यनाथ बनेंगे या राहुल गांधी बनेंगे, अब सवाल ये नहीं है, बल्कि सवाल ये है कि ये चुने कैसे जाएंगे. क्योंकि अगले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संविधान में एक बड़ा संशोधन करने जा रहे हैं, और इस संशोधन के बाद आपका वोटर आईडी कार्ड बदल सकता है, आधार कार्ड, पैन कार्ड और राशन कार्ड पर क्या फर्क पड़ेगा, क्या वो भी बदलना होगा, अभी से देश के करोड़ों हिंदू-मुस्लिम कागजात ढूंढने में क्यों लगे हैं, एक-एक कर सारे सवालों का जवाब आपको देते हैं.

सवाल नंबर 1- पीएम मोदी संविधान में संशोधन क्यों करेंगे?

जवाब- एक देश, एक चुनाव के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करने होंगे.

सवाल नंबर 2- एक देश, एक चुनाव क्या है?

जवाब- पूरे देश में एक साथ विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होंगे, सरपंच से लेकर सांसद तक सब एक ही साल में चुने जाएंगे.

सवाल नंबर 3- वन नेशन, वन इलेक्शन में कितना खर्च आएगा?

जवाब- चुनाव आयोग के मुताबिक एक वोटिंग सेंटर पर 2 EVM लगेगी. 11 लाख 80 हजार पोलिंग बूध बनेंगे, नई ईवीएम बनवानी होगी, हर 15 साल में 10 हजार करोड़ खर्च आएगा.

सवाल नंबर 4- क्या नया वोटर आईडी कार्ड बनेगा

जवाब- पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की कमेटी ने 18 हजार 626 पन्नों की जो रिपोर्ट दी है, उसमें लिखा है पूरे देश के लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहिए, यानि नया कार्ड बन सकता है! आधार और वोटर आईडी लिंक होंगे तो फिर सारे कागजात नए बन सकते हैं.

सवाल नंबर 5- बाबा साहेब आंबेडकर की टीम ने जैसे 60 देशों का संविधान पढ़कर भारत का संविधान बनाया, क्या कोविंद वाली कमेटी ने भी दूसरे देशों से जानकारी जुटाई.

जवाब- स्वीडन, बेल्जियम, जर्मनी, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जहां इस तरह का प्रचलन है, वहां के संविधान को पढ़ा, फिर भारत सरकार को सुझाव दिए.

सवाल नंबर 6- क्या CAA-NRC से इसका कोई लेना-देना है, क्या मुस्लिमों को इससे खास परेशानी होगी

जवाब- जिनके कागजात बाढ़ में बह गए, आपदा में खो गए जो यहीं के रहने वाले हैं, उनके लिए कोई प्रावधान जुड़ेगा, लेकिन जो बाहरी होंगे, उन्हें मुश्किलें होंगी.

यही वजह है कि कई राज्यों में मुस्लिमों के बीच कागज ढूंढने का भ्रम भी फैलाया जा रहा है. लेकिन इन सबसे अलग मोदी सरकार की कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, और आने वाले दिनों में संसद में बिल आ सकता है, जहां इसे दो तिहाई बहुमत से पास करवाना जरूरी होगा, फिर राज्य की विधानसभाओं में पास करवाना होगा, लेकिन ये राह इतनी आसान नहीं होगी, क्योंकि एक देश, एक चुनाव का मॉडल अगर भारत अपनाता है, तो फिर करीब 17 राज्यों में जहां का कार्यकाल अभी 5 साल पूरा नहीं हुआ है, वहां की सरकारों को या तो बर्खास्त करना पड़ेगा, या फिर उन्हें कार्य विस्तार देना पड़ेगा, दोनों ही स्थितियों में संविधान में संशोधन जरूरी होगा, जिस पर कई तरह के सवाल खड़े हो सकते हैं.

हालांकि पत्रकार राशिद किदवाई कहते हैं... PM मोदी जो काम करते हैं, उसकी मंशा ये होती है कि ज्यादा से ज्यादा प्रचार हो. देश में बड़ी आबादी मध्यमवर्ग की है, उनको खर्चा बचाने की बात कहने से सरकार की लोकप्रियता बढ़ जाएगी. यानि एक देश, एक चुनाव पर सियासी विरोध के सुर सुनाई देंगे लेकिन जनता की तरफ से आवाज शायद ही उठे, क्योंकि एक देश-एक चुनाव के पैसे वाले जो फायदे समझाए जा रहे हैं, उसे अगर थोड़ा विस्तार से समझें तो आपको एहसास होगा ये तो काफी पहले हो जाना चाहिए था.

एक देश, एक चुनाव के फायदे

हर साल चुनाव होने से अर्धसैनिक बलों, स्थानीय प्रशासन और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार अपना काम छोड़कर चुनावी ड्यूटी करनी होती है, इस पर रोक लगेगी. पहले लोकसभा के बाद तुरंत विधानसभा या पंचायत चुनाव होने से फिर से सारा खर्चा उठाना पड़ता है, लेकिन एक चुनाव से इस खर्चे पर लगाम लगेगी. एक ही दिन चुनाव हुआ तो इससे वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हो सकती है, नेता बहानेबाजी नहीं कर पाएंगे, कम से कम 4 साल काम करना ही होगा.

लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान ये है कि पहली बार बड़े स्तर पर बदलाव में बड़े बजट की जरूरत पड़ेगी, और मंदी के इस दौर में ऐसे फैसले से सरकार को बचना चाहिए. लोगों के लिए मुश्किल ये होगी कि अलग-अलग चुनावों का लालच देकर वो नेताओं से काम नहीं करवा पाएंगे, बल्कि केन्द्र और राज्य में दोनों जगह एक साथ नेता चुन लेंगे तो वो काम करे या न करे, 5 साल बर्दाश्त करना ही होगा. इसीलिए वन नेशन, वन इलेक्शन के साथ कई लोग ये शर्त जोड़ने की मांग भी कर रहे हैं कि जनता को राइट टू रिकॉल का अधिकार दिया जाए, यानि जो सांसद, विधायक काम न करे, उसे कुर्सी से हटाने का हक भी मिले, ताकि चुनाव के वक्त नेताजी जनता के चरणों में और चुनाव के बाद जनता नेताजी के चरणों में न रहे, बल्कि विकास जारी रहे.

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