नई दिल्ली : 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता से बाहर हो गया और कांग्रेस के साथ यूडीएफ ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया, इसके साथ ही भारत में फिलहाल किसी भी राज्य में वामपंथी दलों की सरकार नहीं बची है. यह लगभग पांच दशकों में पहली बार हुआ है कि कम्युनिस्ट या वाम मोर्चा किसी राज्य की सत्ता में नहीं है.
भारत में वामपंथ का संस्थागत राजनीतिक इतिहास 1957 से शुरू माना जाता है, जब एलमकुलम मनक्कल संकरन नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में केरला में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी थी. इसके बाद वाम राजनीति का असली विस्तार तीन राज्यों में दिखा. केरल, वेस्ट बंगाल और त्रिपुरा. बंगाल में 1977 से 2011 तक लगातार 34 साल वाम मोर्चा सत्ता में रहा, जो भारतीय लोकतंत्र के सबसे लंबे निर्वाचित शासन में से एक है.
इस दौर में ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य प्रमुख चेहरे रहे. त्रिपुरा में भी वामपंथ ने लंबे समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखी, खासकर मनिक सरकार के दौर में हालांकि पतन की शुरुआत धीरे-धीरे हुई. पश्चिम बंगाल में 2006 के बाद उद्योग बनाम जमीन अधिग्रहण का मुद्दा बड़ा टर्निंग पॉइंट बना. नंदीग्राम और सिंगुर आंदोलन ने वामपंथ की किसान-हितैषी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया. भूमि अधिग्रहण, पुलिस कार्रवाई और संगठनात्मक कठोरता ने ग्रामीण वोट बैंक खिसका दिया.