संदीप शर्मा
कहते हैं पंडित नेहरू संयुक्त राष्ट्र में अगर कश्मीर का मुद्दा नहीं ले गए होते तो पीओके हिंदुस्तान के पास होता. पीढ़ियां दर पीढ़ियां गुजरती गईं, 70 सालों में 13 प्रधानमंत्री और 37 विदेश मंत्री देश ने देखे, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर सुषमा स्वराज तक और आईके गुजरात से लेकर नटवर सिंह तक सबने यूएन में भाषण दिया, लेकिन कोई वो बात नहीं कह पाया, जो जयशंकर ने कहा, जिसे सुनते ही समूचा हिंदुस्तान ताली बजाने लगा तो वहीं पाकिस्तान में हड़कंप मच गया. वहां की सेना और सरकार दोनों इस बात की तैयारी करने लगी कि पीओके बचाना कैसे है.
यही माइंड गेम और नैरेटिव का खेल है, जो पाकिस्तान पहले कहता था हिंदुस्तान वाला कश्मीर भी हम ले लेंगे, अब वो ये सोच रहा है पीओके कैसे बचाएं. क्योंकि जयशंकर ने साफ कर दिया है कि पीओके दो तब बात होगी. जयशंकर ने कहा कि हमारे बीच अब केवल पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए भारतीय क्षेत्र को खाली करना ही एकमात्र मुद्दा है. और निश्चित रूप से पाकिस्तान को आ/तंकवाद से लंबे समय से लगाव को अब त्यागना होगा.
जयशंकर जब ये बात कर रहे थे, उससे पहले ही यूएन में भारत की फर्स्ट सेक्रेटरी भाविक मंगलानंदन ने शहबाज शरीफ की क्लास लगाई थी, उनके झूठ की पोल खोली थी. उसके बाद जयशंकर जब खड़े हुए तो उन्होंने नमस्ते से अपने भाषण की शुरुआत की, और फिर भारत विरोधियों के धागे खोल दिए, दोबारा ये बात दोहराई कि भारत दुनिया में शांति का पक्षधर है, यूक्रेन और गाजा में चल रहे हालात को कंट्रोल करने के लिए दुनिया को आगे आना होगा. यहां तक कि जयशंकर यूएन में खड़े होकर यूएन को कैसा होना चाहिए ये भी बताते हैं, लेकिन सवाल ये है कि इन भाषणों से क्या कुछ बदलेगा, क्योंकि भाषण तो पहले के नेताओं ने भी दिए हैं, जयशंकर के भाषण की इतनी चर्चा क्यों है, तो इसे समझने के लिए आप ये तस्वीरें देखिए.
जयशंकर जब कश्मीर पर बोल रहे थे, वहां पिन ड्रॉप साइलेंस वाली स्थिति थी, किसी भी देश ने पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया. यहां तक कि तुर्की, कतर, कुवैत, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे देश जो पाकिस्तान के झूठे दावे का खुलकर समर्थन करते थे, वो भी इस बार कुछ नहीं बोल पाए, संयुक्त राष्ट्र में शायद ये पहली बार था जब पाकिस्तान का किसी ने समर्थन नहीं किया और भारत का दावा दुनिया के 193 देशों के सामने कश्मीर पर पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हुआ और ये सब हुआ बदलती वैश्विक नीति से.
नई वैश्विक नीति से कैसे मजबूत हुआ भारत का दावा
साल 1991 में जब सोवियत संघ से टूटकर 15 देश बने तो रूस को छोड़कर बाकी ज्यादातर देश पाकिस्तान के साथ थे, क्योंकि पाकिस्तान इन सबको सैन्य प्रशिक्षण से लेकर तमाम मदद देता था, इसके अलावा तुर्की और सऊदी अरब जैसे मुल्क से भी पाकिस्तान के रिश्ते काफी अच्छे थे, लेकिन जैसे-जैसे भारत ने पाकिस्तान के आ/तंकप्रेम की पोल खोली, उसकी वैश्विक मदद कम होने लगी. दुनिया ने उसका असल चेहरा देखा, और उसे उसके कर्मों का फल मिलने लगा.
आज पाकिस्तान की जो हालत है, उसके लिए वो खुद जिम्मेदार है, यही बात संयुक्त राष्ट्र में एस जयशंकर भी कहते हैं. कुछ देश जानबूझकर ऐसे फैसले लेते हैं, जिनके परिणाम विनाशकारी होते हैं. इसका एक बेहतरीन उदाहरण हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है. जब यह राजनीति अपने लोगों में इस तरह की कट्टरता भरती है, तो इसकी जीडीपी को केवल कट्टरता और आतंकवाद के रूप में इसके निर्यात के संदर्भ में ही मापा जा सकता है. आज हम देखते हैं कि दूसरों के लिए जो गड्ढे खोदने की कोशिश की गई, उन्हीं में उसका अपना समाज गिर रहा है.
वह दुनिया को दोष नहीं दे सकता; यह केवल कर्म है. पर कहते हैं कर्मों का फल चखने के बाद भी कईयों की अंतरात्मा नहीं जागती और पाकिस्तान भी शायद वैसा ही है, जिसे अब भी ये अक्ल नहीं आ रही कि बीती गलतियों को छोड़कर नए सिरे से आगे बढ़े. स्वेच्छा से भारत को पीओके देकर अपने मुल्क का भला करे.