नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) वाई. के. सब्बरवाल के दो कारोबारी बेटों चेतन और नितिन सब्बरवाल को राहत देने से इनकार कर दिया है. शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ आयकर पुनर्मूल्यांकन का रास्ता साफ कर दिया है. मामला 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड पर एक प्रमुख प्रॉपर्टी खरीदने के लिए किए गए शेयर लेनदेन से जुड़ा है. जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने चेतन और नितिन सब्बरवाल की ओर से दायर चार अपीलें खारिज कर दीं.
साथ ही आकलन वर्ष 2008-09 और 2009-10 के लिए जारी दोबारा आकलन नोटिस को बरकरार रखा. अदालत ने कहा कि आयकर विभाग द्वारा 31 मार्च 2015 को जारी नोटिस आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 147 और 148 के तहत ‘विश्वास करने का आधार’ (Reason to Believe) की वैध कसौटी पर खरा उतरता है. सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर को दिए फैसले में कहा कि महानिदेशक की जांच रिपोर्ट में आकलन अधिकारी के पास यह उचित विश्वास करने के लिए ठोस वजह थी कि कर योग्य आय का आकलन नहीं हो पाया.
अक्टूबर 2007 में सब्बरवाल बंधुओं और दो अन्य शेयरधारकों ने पवन इम्पेक्स (प्राइवेट) लिमिटेड और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर (प्राइवेट) लिमिटेड के शेयर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचने का समझौता किया था. शेयरों की कीमत क्रमशः 195 करोड़ और 60 करोड़ रुपये तय की गई थी. हर विक्रेता को बिक्री राशि का एक-चौथाई हिस्सा मिलना था. आयकर विभाग की जांच में शेयरों के मूल्यांकन पर सवाल उठे थे.
विभाग ने पाया कि बिक्री से मिली राशि संबंधित जमीन और इमारतों की वास्तविक लागत के आधार पर उचित ठहराई जा सकने वाली कीमत से काफी अधिक थी. बिक्री की राशि का एक बड़ा हिस्सा सिकंदरा रोड की प्रॉपर्टी खरीदने में इस्तेमाल हुआ था. जस्टिस योगेश कुमार सब्बरवाल भारत के 36वें चीफ जस्टिस रहे थे. उन्होंने 1 नवंबर 2005 से 14 जनवरी 2007 तक यह पद संभाला था.