Bihar politics: पटना में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले ने बिहार की राजनीति को पूरी तरह हिला दिया है. इस घटना पर सबसे ज्यादा मुखर होकर आवाज उठाने वाले निर्दलीय सांसद पप्पू यादव की हालिया गिरफ्तारी और बाद में रिहाई ने उनकी छवि को एक बार फिर मजबूत कर दिया है. यह पूरा प्रकरण कानूनी होने के साथ-साथ गहरा राजनीतिक रंग ले चुका है. पप्पू यादव ने हॉस्टल में हुई घटना की जांच में खामियों को लगातार उजागर किया, पीड़िता के परिवार से मिले, अस्पताल पहुंचे और सड़क पर उतरकर आंदोलन का रूप दिया.
अन्य विपक्षी नेताओं की तुलना में उनकी यह सक्रियता और जमीनी स्तर पर भागदौड़ काफी अलग दिखी. गिरफ्तारी के समय कई लोगों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध माना, क्योंकि यह ठीक उसी वक्त हुई जब वे सरकार पर इस केस में लापरवाही का दबाव बना रहे थे. रिहाई के बाद पप्पू यादव ने खुद कहा कि सच बोलने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.
इस घटनाक्रम से उनकी लोकप्रियता में इजाफा हुआ है. आम लोग उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देख रहे हैं जो जन मुद्दों पर बिना झिझक लड़ता है. पीड़िता के पिता ने भी खुलकर उनका साथ दिया और कहा कि जो लोग मामले को उठा रहे हैं, उन्हें ही निशाना बनाया जा रहा है. कांग्रेस की ओर से भी मजबूत समर्थन मिला.
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि पप्पू यादव न्याय की आवाज बनकर खड़े हुए और उनकी गिरफ्तारी साफ तौर पर राजनीतिक बदला है. उन्होंने उन्हें साथी सांसद तक कहा. प्रियंका गांधी ने भी फोन पर बात की और गिरफ्तारी की निंदा की. यह समर्थन इसलिए खास है क्योंकि पप्पू यादव किसी पार्टी से नहीं जुड़े, फिर भी उन्हें इतना बड़ा बैकअप मिला.
राजद और तेजस्वी यादव का रुख भी बदला दिखा. तेजस्वी ने गिरफ्तारी पर बयान दिया, सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया और दोषियों को बचाने-निर्दोषों को फंसाने की बात कही. राजद के कुछ नेता भी विरोध में उतरे. याद रहे, पहले तेजस्वी के विरोध के चलते ही पप्पू यादव को राजद या कांग्रेस में जगह नहीं मिली थी, लेकिन अब स्थिति उलट गई है.
नीट मामले में पप्पू यादव की सक्रियता ने उन्हें बिहार के विपक्ष में सबसे प्रमुख चेहरा बना दिया है. तेजस्वी यादव जैसे बड़े नेता बयानबाजी तक सीमित रहे, जबकि पप्पू यादव ने आंदोलन को जन स्तर तक ले जाकर सहानुभूति बटोरी. 2024 में पूर्णिया से बड़ी जीत के बाद यह घटना उनकी ताकत को और बढ़ावा दे रही है.
कुल मिलाकर, यह प्रकरण दिखाता है कि जनहित के मुद्दों पर साहसिक रुख अपनाने से राजनीतिक समीकरण कैसे बदल सकते हैं, भले ही कोई पार्टी का झंडा न हो. पप्पू यादव की यह छवि अब बिहार में काफी मजबूत हो चुकी है.