हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं और जीती हुई बाजी हारने वाले को कांग्रेस कहते हैं. कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा कहते हैं हम चुनाव आयोग के पास जाएंगे, ईवीएम में गड़बड़ है, लेकिन वही कांग्रेस जब जम्मू-कश्मीर में बीजेपी हारती है तो ईवीएम में गड़बड़ी नहीं बताती है. किसान नेता राकेश टिकैत तो सीधा वोटिंग सिस्टम पर ही सवाल उठा देते हैं, जबकि योगेन्द्र यादव बेचैन नजर आते हैं. राकेश टिकैत कहते हैं...हरियाणा में इस सरकार से जानता तो नाराज थी लेकिन पता नहीं ये कैसा मकड़ जाल है. जनता नाराज है फिर भी सरकार उन्हीं की बनती है, ये हमारी समझ में तो नहीं आ रहा है. हमें तो नहीं लगता की हरियाणा में जनता ने मौका दे दिया हो कुछ ना कुछ घालमेल जरूर होगा.
अब राकेश टिकैत का गुस्सा क्या इस बात पर है कि किसान नेता को ही जनता ने हरा दिया. ये किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी को मिले वोटों की संख्या है, जो पिहोवा से चुनाव लड़ रहे थे, इन्होंन मोदी सरकार पर किसानों की आवाज दबाने के आरोप लगाए, लेकिन जब नतीजे आए तो इन्हें कुल मिलाकर 1170 वोट मिले, जबकि बीजेपी प्रत्याशी जय भगवान शर्मा ने 57 हजार 995 और कांग्रेस के मनदीप चट्ठा को 64,548 वोट मिले. यानि यहां कांग्रेस ने ही किसानों के शो कॉल्ड नेता को हरवा दिया, यहां तक कि योगेन्द्र यादव जो घूम-घूमकर ये दावे कर रहे थे कि बीजेपी इस बार सत्ता में नहीं आएगी, उनकी भविष्यवाणी अपने ही घर में गलत साबित हो गई, यहां तक कि खुद को हरियाणा का लाल बताकर कुर्सी हासिल करने की कोशिश कर रहे केजरीवाल को भी जनता ने तगड़ा झटका दिया. आम आदमी पार्टी के कई उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई. लंबे वक्त तक सत्ता में रही चौटाला परिवार को भी इस बार जनता ने बड़ा झटका देकर समझा दिया, हमें परिवारवाद नहीं विकासवाद चाहिए. यहां तक कि केन्द्रीय मंत्री राव इंद्रजीत की बेटी आरती भी अटेली से हार गई.
चौटाला परिवार का पैकअप!
अब सवाल है इतने बड़े-बड़े नेता हारे कैसे, क्या चंद्रशेखर और मायावती ने इनका गेम बिगाड़ दिया, या इनकी खुद की गलतियां भारी पड़ी. उचाना कलां सीट पर तो दुष्यंत चौटाला के प्रचार के लिए चंद्रशेखऱ खुद गए भी थे, जहां गाड़ी पर हमले को लेकर एफआईआर तक की नौबत आ गई थी, पर चंद्रशेखर का दांव जेजेपी और कांग्रेस दोनों को नुकसान पहुंचा गया. यहां तक कि राजस्थान और यूपी में होने वाले उपचुनाव में भी अब कांग्रेस को चिंता सताने लगी है कि ऐसे ही अगर कोर वोटर्स छिटकने लगे तो मामला गड़बड़ हो जाएगा.
इनेलो के साथ गठबंधन कर मायावती की बीएसपी 37 सीटों पर लड़ रही थी, जबकि जेजेपी के साथ चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी. इन दोनों के गठबंधन ने कांग्रेस को दलित वोटों का ऐसा नुकसान पहुंचाया कि जो कांग्रेस रात तक सत्ता का ख्वाब देख रही थी, वो सुबह होते ही ईवीएम पर सवाल उठाने लगी, और फिर हर कोई ये पूछने लगा कि राहुल गांधी अब जलेबी वाली फैक्ट्री लगाएंगे या नहीं.