रूस के उप प्रधानमंत्री पीएम मोदी से की मुलाकात, जर्मनी की बढ़ी टेंशन!

Abhishek Chaturvedi 09 Apr 2026 11:40: PM 3 Mins
रूस के उप प्रधानमंत्री पीएम मोदी से की मुलाकात, जर्मनी की बढ़ी टेंशन!

...ये हैं रूस के उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव जो बीते हफ्ते दिल्ली आते हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करते हैं, और उर्वरक यानि खाद से लेकर व्यापार तक पर बड़ी चर्चा करते हैं. उसके ठीक बाद मीडिया में ये ख़बर आती है कि रूस की ओर से तीन बड़े प्रस्ताव आते हैं.

  • पहला- हम 40 फीसदी सस्ता LNG यानि लिक्विफाइड नेचुरल गैस बेचने को तैयार हैं, दक्षिण एशिया में गैस की कोई कमी नहीं होने देंगे.
  • दूसरा- कच्चे तेल की आपूर्ति हम भारत को लगातार बढ़ाते रहेंगे, ताकि यहां ऊर्जा संकट जैसी कोई स्थिति पैदा न हो.
  • तीसरा- S-500 और मिसाइल रक्षा सिस्टम में हम साथ मिलकर काम करने को उत्सुक हैं, 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर पहुंचाएंगे.

जो ये बताता है रूस जैसा कोई और नहीं है, संकट के वक्त जब भारत को तेल, खाद और गैस की सबसे ज्यादा जरूरत है, उस वक्त रूस अपने यहां से हर जरूरी सामान भेजने को तैयार है, इसमें उसके बिजनेस का फायदा भी है, लेकिन भारत और रूस की दोस्ती दशकों से मजबूत रही है, पुतिन-मोदी की दोस्ती के किस्से भी खूब सामने आते रहे हैं, इसलिए इस प्रस्ताव को दोस्ती के नजरिए से देखा जा रहा है...

क्योंकि सीजफायर के बाद भी होर्मुज अभी खुला नहीं है, कतर का गैस प्लांट पहले से तबाह है, जिसे बनने में महीनों लग सकते हैं, ऐसे वक्त में भारत को अगर सस्ता सामान मिलता है तो इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती. शायद यही वजह है क रूस के डिप्टी पीएम मिडिल ईस्ट में चल रहे जंग के हालात के बीच जब भारत आए तो कई बड़ी डील होने की चर्चा होने लगी...लेकिन यहां सबसे बड़ा पेंच अमेरिका है, वो रूस से खरीद पर प्रतिबंध लगाते रहता है, जिसका जवाब पहले भी जयशंकर दे चुके हैं, और इस बार भी ये कह सकते हैं कि हमें जहां फायदा होगा, वहीं से व्यापार करेंगे. क्योंकि एक बात तो साफ है कि अमेरिका किसी का सगा नहीं है, और इसका बड़ा उदाहरण आपको आने वाले दिनों में जर्मनी से मिल सकता है, क्योंकि ट्रंप ने कहा है कि नाटो किसी काम का नहीं है, और हम उससे अलग हो सकते हैं, ऐसे में...

  • जर्मनी को ये डर सता रहा है कि अगर नाटो टूटा तो रूस सबसे पहले उस पर हमला करेगा
  • कभी सोवियत संघ पर जर्मनी ने खूब हमले किए थे और इस वक्त वो यूक्रेन के साथ खड़ा है
  • जबकि सेना के मामले में जर्मनी काफी पीछे है, उसके पास सिर्फ 1 लाख 80 हजार सैनिक हैं
  • फाइटर प्लेन और मिसाइल से लेकर तमाम युद्ध तकनीक भी रूस की तुलना में वहां कम हैं

शायद यही वजह है कि जंग के बीच उसने अपने नागरिकों के लिए एक सख्त आदेश जारी किया है, जिसके मुताबिक तीन महीने से ज्यादा के लिए अगर 17 साल से ज्यादा उम्र का कोई व्यक्ति विदेश जा रहा हो, तो उसे अपनी सेना और सरकार से अनुमति लेनी होगी, इस तरीके का नियम लाने वाला जर्मनी शायद पहला देश बन गया है, क्योंकि उसे ये लगता है कि अगर रूस ने हमला किया और सेना की संख्या कम पड़ी तो अपने लोगों को वो जंग के मैदान में ट्रेनिंग देकर उतार सकता है. पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या रूस ऐसा कदम उठाएगा, क्योंकि बीते दिनों पुतिन जब एक जर्मन ने अंग्रेजी में सवाल पूछा था तो पुतिन ने कहा था आप जर्मन में बोलो, अपनी भाषा क्यों छोड़ रहे.

जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोग ये कहने लगे कि पूरा यूरोप अपनी-अपनी भाषाओं पर गर्व करता है, लेकिन हमारे यहां कुछ लोग अंग्रेजी सीखते ही उसे स्टेट्स सिंबल मान लेते हैं औऱ हिंदी को भूल जाते हैं. तो ऐसा करने से बचें, क्योंकि अपने भाषाई गौरव को साथ लेकर चलना भी आपकी जिम्मेदारी है. फिलहाल रूस के दोस्ताना रवैये पर आपकी क्या राय है, क्या वो अमेरिकी प्रतिबंधों से हटने के लिए ऐसा कर रहा है, वो अपना मार्केट मजबूत कर रहा है, या फिर ये बात सिर्फ दोस्ती की है..

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