नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बुधवार को एक दंपति का विवाह खत्म कर दिया, जो पिछले दस साल से अलग-अलग रह रहे थे. बेंच ने इस विवाद को मैट्रिमोनियल बैटल ऑफ महाभारत यानि महाभारत जैसा वैवाहिक युद्ध करार दिया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की असाधारण प्रकृति पर प्रकाश डाला.
अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे, उनके रिश्तेदारों और यहां तक कि अपने वकीलों के खिलाफ भी 80 से ज्यादा मुकदमे दायर किए थे. कोर्ट ने पति को अपनी पत्नी को 5 करोड़ रुपए का स्थायी गुजारा भत्ता (Alimony) देने का आदेश दिया. बेंच ने पति, जो खुद एक वकील हैं की तीखी आलोचना की और कहा कि उन्होंने अपनी कानूनी विशेषज्ञता का दुरुपयोग करते हुए मुकदमेबाजी को जानबूझकर लंबा खींचा और न्यायिक प्रक्रिया को बाधित किया.
अदालत ने यह भी निंदनीय बताया कि पति ने पत्नी के वकीलों को डराने-धमकाने के लिए विभिन्न फोरम में नौ अलग-अलग मुकदमे दायर किए थे. पति ने दावा किया था कि उन्होंने कॉर्पोरेट डायरेक्टरशिप से इस्तीफा दे दिया है, इसलिए वे स्थायी गुजारा भत्ता नहीं दे सकते. कोर्ट ने इस दावे को धोखा करार दिया और कहा कि यह केवल अपने वित्तीय दायित्व से बचने की कोशिश है.
कोर्ट ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पत्नी की उच्च शैक्षणिक योग्यता और प्रोफेशनल स्टेटस के कारण वह गुजारा भत्ता देने से मुक्त है. जस्टिस ने कहा कि पत्नी की शिक्षा और नौकरी का मतलब यह नहीं है कि पति बच्चों के पालन-पोषण और भविष्य की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए. आधुनिक जीवन की उच्च लागत और बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए अदालत ने साफ कहा कि पति नैतिक और कानूनी रूप से बच्चों के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार है, भले ही पत्नी प्रोफेशनली स्थापित हो.
कोर्ट ने टिप्पणी की, ''हम पति के वित्तीय अक्षमता वाले दावे में दम नहीं पाते. यह केवल अपने कानूनी और नैतिक दायित्वों से बचने का एक बहाना है.'' अंत में, कोर्ट ने पत्नी को पति के पिता के स्वामित्व वाले अपार्टमेंट को खाली करने का भी निर्देश दिया.