नारायणपुर: आंध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़-तेलंगाना की त्रिकोणीय सीमा पर पुल्लागांडी के घने जंगलों में मंगलवार सुबह चली गोलीबारी ने नक्सल उन्मूलन अभियान को नई ऊंचाई दे दी. छत्तीसगढ़ के शीर्ष नक्सली सरदार माड़िया हिड़मा, जिस पर 1 करोड़ रुपए का इनाम था, को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया. उसके साथ उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का सहित छह नक्सलियों का भी अंत हो गया. यह इस साल नक्सलवाद के खिलाफ पुलिस की सबसे बड़ी जीतों में से एक है.
बस्तर रेंज के आईजी पी. सुंदरराज ने बताया कि 18 नवंबर को आंध्र प्रदेश पुलिस और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ में जवानों ने छह शव बरामद किए. इनमें केंद्रीय कमेटी के सदस्य हिड़मा भी शामिल था, जो कभी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की पहली बटालियन का कमांडर रह चुका था. घटनास्थल से एके-47 राइफलें, ग्रेनेड लॉन्चर और ढेर सारा गोला-बारूद भी जब्त हुआ है.
हिड़मा का नाम बस्तर के खौफनाक नक्सली हमलों से जुड़ा हुआ है. 2010 के दंतेवाड़ा नरसंहार, जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे, का मास्टरमाइंड यही था. यह नक्सल इतिहास का सबसे खूनी हमला था. उसके बाद केंद्र सरकार ने हिड़मा को सरेंडर करने की बार-बार अपील की. गृह मंत्री अमित शाह ने तो उसके पैतृक गांव जाकर परिवार से मिले और पुनर्वास का मार्ग दिखाया.
शाह ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा था कि हिड़मा और उसके साथी बरसे देवा की माताओं को सलाम. उन्होंने भोजन साझा किया और नक्सलियों के परिजनों से सरेंडर के लिए प्रेरित करने की गुजारिश की. इसी सिलसिले में हिड़मा और बरसे देवा की मांओं ने एक भावुक वीडियो जारी किया था. दो मिनट के इस वीडियो में मां ने बेटे से कहा, ''बेटा, बंदूक छोड़ दो... मुख्यधारा में लौट आओ, नया जीवन शुरू करो.'' लेकिन हिड़मा ने मां की पुकार अनसुनी कर दी. अपील के ठीक एक हफ्ते बाद ही सुरक्षाबलों ने उसे घेर लिया.
अमित शाह ने हाल ही में नक्सलियों को 30 नवंबर तक सरेंडर करने की अंतिम चेतावनी दी थी. हिड़मा ने इसे ठुकरा दिया, जिसके बाद यह ऑपरेशन तेज हुआ. 1981 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुरवती गांव (तब मध्य प्रदेश का हिस्सा) में एक आदिवासी परिवार में जन्मे हिड़मा ने 1990 के दशक के अंत में किशोरावस्था में ही नक्सल आंदोलन का दामन थाम लिया. शुरू में स्थानीय संघम (मिलिशिया) का सदस्य बना, फिर अपनी क्रूरता, सहनशक्ति और जंगलों की गहरी समझ के दम पर PLGA में ऊंचा पद हासिल किया. वह बस्तर का आतंक का प्रतीक बन गया.
हमेशा घात लगाकर हमला करने वाला, कभी पकड़े न जाने वाला. गृह मंत्रालय के अनुसार, हिड़मा जैसे कमांडरों के सफाए से नक्सलवाद की जड़ें कमजोर हो रही हैं. लेकिन बस्तर के जंगलों में अभी भी चुनौतियां बाकी हैं. सुरक्षाबलों का यह ऑपरेशन न सिर्फ हिड़मा को नेस्तनाबूद करने में कामयाब रहा, बल्कि नक्सलियों के मनोबल को भी तोड़ने का काम किया है. अब देखना यह है कि इस सफलता से बस्तर में शांति की नई किरण तो नहीं चमकेगी.