नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में स्कूलों, कॉलेजों, कोचिंग सेंटरों, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण संस्थानों और हॉस्टलों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं को रोकने के लिए 15 दिशानिर्देश जारी किए हैं. कोर्ट ने कहा कि पढ़ाई का तनाव, परीक्षा का दबाव और संस्थानों में समर्थन की कमी के कारण कई छात्र आत्महत्या कर रहे हैं.
क्यों जरूरी है यह कदम?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 1,70,924 आत्महत्याओं में से 13,044 छात्रों ने अपनी जान दी. 2001 में यह संख्या 5,425 थी. हर 100 आत्महत्याओं में 8 छात्रों की थीं. 2,248 छात्रों ने परीक्षा में असफलता के कारण आत्महत्या की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये आँकड़े व्यवस्था में खामियों को दर्शाते हैं, जिन्हें तुरंत ठीक करना जरूरी है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत ये निर्देश जारी किए. कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद या राज्य विधानसभाएं इस पर कानून नहीं बनातीं, तब तक यह आदेश अनुच्छेद 141 के तहत कानून की तरह लागू रहेगा. यह फैसला आंध्र प्रदेश में एक 17 वर्षीय नीट उम्मीदवार की आत्महत्या के मामले की सुनवाई के दौरान आया. यह छात्रा विशाखापट्टनम के एक कोचिंग सेंटर में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी और हॉस्टल में रहती थी. 14 जुलाई 2023 को उसकी मृत्यु हो गई.
उसके पिता ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच की मांग की थी. आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 14 फरवरी 2024 को इस मांग को खारिज कर दिया था. इसके बाद पिता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जिसने अब CBI को इस मामले की जांच का आदेश दिया है. कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि ये दिशानिर्देश सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस रविंद्र एस. भट की अध्यक्षता वाली छात्र मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय टास्क फोर्स के काम को पूरक बनाते हैं.