शरिया अदालतों के फैसलों का कोई कानूनी आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Amanat Ansari 29 Apr 2025 07:40: PM 2 Mins
शरिया अदालतों के फैसलों का कोई कानूनी आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया कि शरिया अदालतों, जिन्हें "काजी कोर्ट", "दारुल कजा" या "कजियत कोर्ट" कहा जाता है, का भारत में कोई कानूनी दर्जा नहीं है. इन संस्थाओं द्वारा दिए गए निर्देश या फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं और इन्हें कानूनी तौर पर लागू नहीं किया जा सकता. यह फैसला जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने सुनाया. यह मामला एक मुस्लिम महिला की अपील से जुड़ा था, जिसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें फैमिली कोर्ट के गुजारा भत्ता न देने के फैसले को सही ठहराया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2014 के फैसले (विश्व लोचन मदान बनाम भारत सरकार) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि शरिया अदालतों या उनके फतवों को भारतीय कानून में कोई मान्यता नहीं है. कोर्ट ने दोहराया कि ऐसी संस्थाओं का कोई न्यायिक दर्जा नहीं है और उनके फैसले तभी मान्य हो सकते हैं, जब संबंधित पक्ष स्वेच्छा से इन्हें स्वीकार करें और ये फैसले कानून के खिलाफ न हों.

मामले की बात करें तो, एक महिला को फैमिली कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था. फैमिली कोर्ट ने कहा था कि महिला ही वैवाहिक विवाद के लिए जिम्मेदार थी. यह निष्कर्ष मध्य प्रदेश के भोपाल में एक "काजी कोर्ट" के सामने पेश किए गए "सेटलमेंट डीड" (समझौता दस्तावेज) पर आधारित था. सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि गैर-न्यायिक संस्थाओं जैसे शरिया अदालतों के बयानों पर भरोसा करके कानूनी हक तय नहीं किए जा सकते. कोर्ट ने कहा, "ऐसे बयान, भले ही स्वेच्छा से स्वीकार किए गए हों, सिर्फ सहमति देने वाले पक्षों के बीच लागू हो सकते हैं और तीसरे पक्ष को बाध्य नहीं कर सकते."

महिला की शादी 24 सितंबर 2002 को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी. यह दोनों पक्षों की दूसरी शादी थी. 2005 में पति ने "काजी कोर्ट" में तलाक के लिए अर्जी दी, जो समझौते के बाद खारिज हो गई. तीन साल बाद, 2008 में, पति ने "दारुल कजा" कोर्ट में दूसरी बार तलाक की प्रक्रिया शुरू की. उसी साल महिला ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगा. 2009 में शरिया संस्था ने तलाक की अनुमति दी और औपचारिक तलाकनामा जारी हुआ.

लेकिन फैमिली कोर्ट ने महिला के खिलाफ फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि पति ने उसे छोड़ा नहीं था, बल्कि महिला का व्यवहार वैवाहिक रिश्ते टूटने का कारण था. कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि यह दोनों की दूसरी शादी थी, इसलिए दहेज की मांग की संभावना नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह आधारहीन और कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि काजी कोर्ट के सामने पेश समझौता दस्तावेज गुजारा भत्ता न देने का आधार नहीं बन सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह महिला को फैमिली कोर्ट में याचिका दायर करने की तारीख से 4,000 रुपए प्रति माह गुजारा भत्ता दे. इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि शरिया अदालतों के फैसलों का कोई कानूनी आधार नहीं है और कानूनी अधिकारों को तय करने में इनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

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