नई दिल्ली: 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग के अध्यक्ष जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान का रविवार को 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रोहित सूद ने चंडीगढ़ में उनके निधन की जानकारी दी. उनका अंतिम संस्कार सोमवार को किया गया.
जस्टिस लिब्रहान मद्रास और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे. उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय आयोग का नेतृत्व किया था. यह आयोग स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक चलने वाले जांच आयोगों में से एक था, जिसने 17 साल तक काम किया, 48 बार विस्तार लिया, 315 से अधिक बैठकें कीं और करीब 100 गवाहों की गवाही दर्ज की.
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने के 10 दिन बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की सरकार ने उन्हें आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था. जून 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी गई रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि विध्वंस नियोजित था. रिपोर्ट में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं समेत उमा भारती, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन यूपी मुख्यमंत्री पर जिम्मेदारी तय की गई थी.
रिपोर्ट के अनुसार करीब 1.5 लाख कारसेवक अयोध्या में जमा हुए थे और लगभग 5,000 कारसेवकों ने सुरक्षा बलों को पीछे धकेलकर मस्जिद गिरा दी. आयोग ने इसे स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि सुनियोजित बताया था. 2020 में विशेष सीबीआई अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था. इसके बावजूद जस्टिस लिब्रहान अपने निष्कर्षों पर अडिग रहे. उन्होंने कहा था कि यह रिपोर्ट इतिहास का हिस्सा बनेगी और घटना का ईमानदार ब्योरा देगी.
जस्टिस लिब्रहान का कानूनी करियर 1964 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से शुरू हुआ था. वे हरियाणा के एडवोकेट जनरल भी रहे और बाद में हाईकोर्ट के जज बने. सेवानिवृत्ति के बाद वे ज्यादातर सार्वजनिक जीवन से दूर रहे. उनकी मृत्यु के साथ बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया है.