180 से ज्यादा वैज्ञानिकों की गंभीर चेतावनी, भारत में आने वाला है तबाही वाला मौसम!

Amanat Ansari 19 Sep 2026 09:40 PM 3 Mins
180 से ज्यादा वैज्ञानिकों की गंभीर चेतावनी, भारत में आने वाला है तबाही वाला मौसम!

नई दिल्ली: भारत के 180 से अधिक पर्यावरण और मौसम वैज्ञानिकों ने 2026-27 में आने वाले बेहद शक्तिशाली अल-नीनो को लेकर गंभीर चेतावनी दी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अल-नीनो सामान्य वर्षों से कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकता है और भारत के जंगलों, नदियों, समुद्रों, पहाड़ों तथा वन्यजीवों पर गहरा असर डाल सकता है.

उन्होंने सरकार, शोध संस्थानों और फंडिंग एजेंसियों से तुरंत तैयारी शुरू करने की अपील की है ताकि नुकसान होने के बाद अध्ययन करने के बजाय पहले से ही निगरानी और रिकॉर्ड की व्यवस्था की जा सके. यह शोध 16 सितंबर 2026 को जेनोडो प्लेटफॉर्म पर “सुपर अल-नीनो की दस्तक: 2026/27 में ईकोलॉजिस्ट के लिए चेतावनी और चुनौती” नाम से प्रकाशित हुआ है.

अल-नीनो क्या है और इस बार क्यों खास?

अल-नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का पानी सामान्य से काफी अधिक गर्म हो जाता है. इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है. भारत में आमतौर पर इसका संबंध कमजोर या देर से आने वाले मॉनसून और अधिक गर्मी से देखा जाता है. हालांकि हर अल-नीनो का प्रभाव एक जैसा नहीं होता. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है, इसलिए आने वाले महीनों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. यह स्थिति सामान्य अल-नीनो वर्षों से काफी अलग हो सकती है.

गर्मी और सूखे का बढ़ता खतरा

वैज्ञानिकों को आशंका है कि नवंबर 2026 से अगले साल तक भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्म और सूखा मौसम देखने को मिल सकता है. बारिश कम होने पर पानी की कमी बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर खेती, जंगलों और पशुपालन पर पड़ेगा. सबसे ज्यादा प्रभाव उन इलाकों पर हो सकता है जहां पहले से ही पानी की कमी रहती है. रेगिस्तानी क्षेत्रों और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में रहने वाले पौधों तथा जानवरों के लिए ऐसी स्थिति और भी कठिन हो सकती है. पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ने से न केवल कृषि उत्पादन प्रभावित होगा बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी दबाव में आ सकती है.

शहरों में भी गर्मी का असर बढ़ सकता है क्योंकि कंक्रीट और सड़कों के कारण शहरी क्षेत्र पहले से ही आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं. लंबे समय तक चलने वाली तेज गर्मी लोगों के स्वास्थ्य और शहरों में लगे पेड़-पौधों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. लगातार गर्मी और पानी की कमी से जंगलों में आग लगने का खतरा काफी बढ़ सकता है. सूखे जंगल जल्दी आग पकड़ सकते हैं और आग लंबे समय तक फैल सकती है. इससे पेड़-पौधों के साथ-साथ पक्षियों और दूसरे वन्यजीवों को भारी नुकसान हो सकता है.

मौसम में अचानक बदलाव से जानवरों के भोजन, प्रजनन चक्र और रहने के स्थान पर भी असर पड़ सकता है. इससे जंगलों में अलग-अलग प्रजातियों के बीच संतुलन बदलने की आशंका है, जिसका प्रभाव पूरी भोजन श्रृंखला पर पड़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते निगरानी नहीं बढ़ाई गई तो इन बदलावों को ठीक से समझना और दर्ज करना मुश्किल हो जाएगा.

समुद्री क्षेत्रों में बढ़ती समस्या

अल-नीनो का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा. भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में समुद्र का तापमान बढ़ने से समुद्री लू यानी मरीन हीटवेव आ सकती हैं. समुद्र का पानी बहुत गर्म होने पर प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ) में बड़े पैमाने पर ब्लीचिंग हो सकती है, जिससे कोरल कमजोर होकर मर सकते हैं.

समुद्री तापमान में बदलाव से मछलियों के रहने और भोजन खोजने के स्थान भी बदल सकते हैं. इसका सीधा असर मछुआरों की कमाई पर पड़ेगा. तटीय समुदाय जो मछली पकड़ने पर निर्भर हैं, उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए समुद्री ईकोसिस्टम की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है जितनी स्थलीय क्षेत्रों की.

इंसानों पर प्रभाव और तैयारी की जरूरत

प्राकृतिक बदलावों का असर आखिरकार आम लोगों तक पहुंचता है. किसान, मछुआरे और पशुपालक मौसम पर काफी निर्भर रहते हैं. कम बारिश और अधिक गर्मी से खेती प्रभावित हो सकती है. पहाड़ी इलाकों में घास कम होने से पशुपालकों के सामने चारे की समस्या आ सकती है.

वैज्ञानिकों ने जोर दिया है कि इस बार नुकसान होने के बाद अध्ययन करने के बजाय पहले से तैयारी करनी चाहिए. इसके लिए पुराने शोध और लंबे समय से चल रहे पर्यावरणीय स्टडीज को जारी रखना जरूरी है. स्थानीय स्तर पर छोटे मौसम केंद्र बनाए जाने, तापमान और नमी का रिकॉर्ड रखने तथा अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग बढ़ाने की मांग की गई है.

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